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पांच दशक से नहीं मिला मालिकाना हक
राजेश नेगी /अमर उजाला ब्यूरो, लालकुआं (नैनीताल)।
Updated Thu, 18 Feb 2016 01:07 AM IST
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प्रदेश में तमाम जगहों की तरह की सरकारों की उदासीनता का खामियाजा लालकुआं वासियों को भी झेलना पड़ रहा है। नगर पंचायत का दर्जा तो दे दिया गया लेकिन इस नगर में रहने वालों को पचास साल बाद भी भूमि का मालिकाना हक नहीं मिला है।
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सरकारों की उदासीनता को अब लोगों को गुस्सा पनपने लगा है। लोगों का मानना है कि अब तक प्रदेश में सत्तासीन रहीं भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ एकजुट होकर ही लोग अपना अधिकार पा सकेंगे। इसके लिए जंग लड़ने का भी लोगों ने ऐलान किया है।
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रेता बजरी, बेशकीमती व उच्चकोटि के प्रकाष्ठ की प्रसिद्ध मंडी और सेंचुरी मिल की वजह से लालकुआं की पूरे देश में अलग पहचान है। 5156 मतदाता, 12500 जनसंख्या और 1537 परिवारों के नगरवासी मालिकाना हक की गुहार लगाते-लगाते थक गए हैं।
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मालिकाना हक नहीं मिलने से जहां शहर का विकास बाधित हो रहा है वहीं कारोबारियों को तमाम तरह की सुविधाओं से महरूम होना पड़ा है।
लगभग सौ वर्ष पूर्व में बसे नगर को वर्ष 1927 को डिफॅारेस्ट किया गया। आजादी के बाद से ही स्थानीय लोगों ने इस संबंध सरकार से पत्राचार कर राजस्व गांव का दर्जा दिलाने की मांग की। 23 दिसंबर 1975 को लालकुआं को राजस्व ग्राम घोषित किया गया। 1978 में नगर के सर्वेक्षण एवं अभिलेखन की कार्यवाही शुरू की गयी।
जिसमें यहां रहने वाले लोगों को खतौनी पर्ची दी गई। लेकिन अचानक उसे निरस्त कर दिया गया। 1978 में लालकुआं को नगर पंचायत का दर्जा दिया गया। राज्य गठन के बाद 30 जुलाई 2005 को उत्तराखंड सरकार ने नगर का पुन: सर्वे कराया। जिसमें नगर की पूरी भूमि का नक्शा, क्षेत्रफल, खसरा तैयार कर लिया गया।
तब से आज तक लोगों को पट्टा मात्र इसलिए नहीं दिया गया कि सरकार यह तय नहीं कर पा रही है कि लालकुआं की भूमि को किस श्रेणी में रखा जाये। जबकि लालकुआं की पूरी भूमि खाम के नाम दर्ज थी। अभिलेखों के अनुसार कई लोगों को पूर्व पट्टे भी आवंटित किये गये थे। लेकिन सरकारी हीलाहवाली के चलते यहां के लोगों को उनको भूमि का मालिकाना हक नही मिल सका ।
पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी, विजय बहुगुणा, तत्कालीन मंडलायुक्त राकेश शर्मा ने भी मालिकाना हक दिलाने का आश्वासन दिया। राजस्व मंत्री यशपाल आर्य के देहरादून आवास पर श्रम मंत्री हरीशचंद्र दुर्गापाल की उपस्थिति में अधिकारियों की उच्चस्तरीय बैठक हुई। जिसमें नगर में काबिज लोगों की सूची मंगाने व सर्किल रेट तय करने का निर्णय लिया गया था। अधिकारियों ने सभी औपचारिकताएं पूरी कर पत्रावली सचिवालय में जमा कर दी परंतु 6 माह से भी अधिक समय बीत जाने के बावजूद भी मालिकाना हक दिलाने का मामला कैबिनेट की बैठक में नहीं लाया गया।