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प्रसिद्ध सरोद वादक अमजद अली खां ने प्रकृति के सौंदर्य को करीब से निहारा
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रामनगर (नैनीताल)। मेट्रो सिटी की भीड़भाड़ से दूर एकांत में समय गुजारने के लिए प्रसिद्ध सरोद वादक अमजद अली खां परिवार के साथ रामनगर पहुंचे। ढिकुली स्थित एक रिजॉर्ट में नदी किनारे बैठकर उन्होंने प्रकृति के सौंदर्य को निहारा। बृहस्पतिवार को प्रसिद्ध सरोद वादक लौट गए।
ढिकुली स्थित रिजॉर्ट में रविवार को सरोद वादक पत्नी, बेटे आहान व आयान के साथ पहुंचे। परिवार के अन्य सदस्यों ने जहां जंगल सफारी का लुत्फ उठाया वहीं वह कोसी नदी के किनारे बैठे रहे और शांत वातावरण और प्रकृति को निहारते रहे। रिजॉर्ट के जीएम अजय करीर ने बताया कि दो दिन रुकने के बाद वह लौट गए हैं।
कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके हैं अमजद अली खां
ग्वालियर में संगीत के ‘सेनिया बंगश’ घराने की छठी पीढ़ी में जन्मे अमजद अली खां को संगीत विरासत में प्राप्त हुआ था। इनके पिता उस्ताद हाफिज अली खां ग्वालियर राज-दरबार में प्रतिष्ठित संगीतज्ञ थे। इस घराने के संगीतज्ञों ने ही ईरान के लोकवाद्य ‘रबाब’ को भारतीय संगीत के अनुकूल परिवर्द्धित कर ‘सरोद’ नामकरण किया। सरोद वादक अमजद अली खां को यूनेस्को पुरस्कार, कला रत्न पुरस्कार, 1975 में पद्मश्री, 1989 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1989 तानसेन सम्मान, 1991 में पद्म भूषण, 2001 में पद्म विभूषण पुरस्कार मिल चुके हैं।
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ढिकुली स्थित रिजॉर्ट में रविवार को सरोद वादक पत्नी, बेटे आहान व आयान के साथ पहुंचे। परिवार के अन्य सदस्यों ने जहां जंगल सफारी का लुत्फ उठाया वहीं वह कोसी नदी के किनारे बैठे रहे और शांत वातावरण और प्रकृति को निहारते रहे। रिजॉर्ट के जीएम अजय करीर ने बताया कि दो दिन रुकने के बाद वह लौट गए हैं।
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कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके हैं अमजद अली खां
ग्वालियर में संगीत के ‘सेनिया बंगश’ घराने की छठी पीढ़ी में जन्मे अमजद अली खां को संगीत विरासत में प्राप्त हुआ था। इनके पिता उस्ताद हाफिज अली खां ग्वालियर राज-दरबार में प्रतिष्ठित संगीतज्ञ थे। इस घराने के संगीतज्ञों ने ही ईरान के लोकवाद्य ‘रबाब’ को भारतीय संगीत के अनुकूल परिवर्द्धित कर ‘सरोद’ नामकरण किया। सरोद वादक अमजद अली खां को यूनेस्को पुरस्कार, कला रत्न पुरस्कार, 1975 में पद्मश्री, 1989 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1989 तानसेन सम्मान, 1991 में पद्म भूषण, 2001 में पद्म विभूषण पुरस्कार मिल चुके हैं।
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