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खेती किसानी पर गहराया संकट
सुधाकर भट्ट हल्द्वानी।
Updated Thu, 14 Jul 2016 11:51 PM IST
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सरकार के तमाम दावों के बीच उत्तराखंड में किसान बदहाल और कर्जदार हो रहा है और खेती की अन्नदायिनी शक्ति पर संकट है। 2003 में कुल 7.2 प्रतिशत किसान कर्ज में थे, अब 38.27 किसान परिवार कर्ज में हैं। पिछले पांच सालों में ही प्रदेश का वास्तविक बोया गया क्षेत्रफल कम हुआ है और उत्पादन में कमी आई है। यह तब है जब कांग्रेस सरकार गन्ना, गहत और गलगल को बढ़ावा देने का दावा कर रही है और भाजपा भी किसान के प्रति प्रेम को जाहिर करती रही है।
अर्थ एवं संख्या निदेशालय का ताजा अध्ययन बता रहा है कि राज्य गठन के बाद से ही प्रदेश में खेती किसानी हाशिये पर है। प्रदेश में करीब 20 लाख किसान और खेती किसानी से जुड़े लोग हैं। इस समय करीब 71 प्रतिशत उत्तराखंड ग्रामीण क्षेत्र में रह रहा है। सामाजिक आर्थिक अध्ययन के मुताबिक 2011-12 में प्रदेश की कुल कमाई (जीडीपी) में कृषि का प्रतिशत 14.48 था। 2015-16 में यह घटकर 13.07 प्रतिशत रहा गया। 2009-10 में वास्तविक बोया गया क्षेत्रफल 7.41 लाख हेक्टेयर था। अब यह 7.01 लाख हेक्टेयर रह गया है। 2014-15 की वार्षिक योजना में कुल बजट में कृषि का हिस्सा 1.31 प्रतिशत था। 2015-16 में यह 1.31 प्रतिशत ही रह पाया। जाहिर है कि सरकारी खर्च खेती किसानी पर बेहद कम है।
खेती के हाशिये पर जाने का असर प्रदेश की सबसे बड़ी वर्क फोर्स पर पड़ा है। 2003 में केवल 7.2 प्रतिशत किसान थे, जिन पर बकाया था। अब बकायेदार किसान 38.27 प्रतिशत है। खेती घाटे में भी है। 2003 में उत्तराखंड में खेती से प्रति किसान की औसत आय 1953 रुपये थी। देश के लिए यह औसत 969 रुपये था। अब प्रदेश में यह औसत 2531 है और देश के लिए 3081 है।
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आपदा से हो रहे नुकसान की भरपाई भी किसानों को खास नहीं हो पा रही है। राज्य गठन के बाद से अब तक कुल 6.41 लाख किसान विभिन्न बीमा योजनाओं के दायरे में आए और इनमें से केवल 1.48 लाख किसानों को ही नुकसान की भरपाई के रूप में 54.31 करोड़ रुपये मिल पाए।
खेती किसानी की यह उपेक्षा पहाड़ और मैदान के बीच की खाई भी बढ़ा रही है। मैदानी जिलों की प्रति व्यक्ति आय एक लाख के आसपास है और 10 पर्वतीय जिलों में प्रति व्यक्ति औसत आय करीब 70 हजार रुपये है। पहाड़ खेती और बागवानी पर निर्भर है और मैदान उद्योग और सेवा क्षेत्र पर।
परंपरागत खेती बचेगी तो होगा विकास
राजनीतिक इच्छा शक्ति के न होने से अलग खेती के परंपरागत स्वरूप को बचाने की कोशिश न होना एक बड़ी वजह है। परंपरागत बीज की जगह बाहर से लाए गए बीज उपयोग में लाए जा रहे हैं। इससे उत्पादकता भी घट रही है और उत्पादन भी कम हो रहा हैै। इसके साथ ही पलायन एक बड़ी समस्या है। पर्वतीय जिलों की अर्थव्यवस्था की रीढ़ खेती किसानी है। मौसम बदलाव के कारण भी अब और बड़ी चुनौती सामने आ रही है।
-डॉ. नंदन एस बिष्ट, अर्थशास्त्री, कुमाऊं विश्वविद्यालय।
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अर्थ एवं संख्या निदेशालय का ताजा अध्ययन बता रहा है कि राज्य गठन के बाद से ही प्रदेश में खेती किसानी हाशिये पर है। प्रदेश में करीब 20 लाख किसान और खेती किसानी से जुड़े लोग हैं। इस समय करीब 71 प्रतिशत उत्तराखंड ग्रामीण क्षेत्र में रह रहा है। सामाजिक आर्थिक अध्ययन के मुताबिक 2011-12 में प्रदेश की कुल कमाई (जीडीपी) में कृषि का प्रतिशत 14.48 था। 2015-16 में यह घटकर 13.07 प्रतिशत रहा गया। 2009-10 में वास्तविक बोया गया क्षेत्रफल 7.41 लाख हेक्टेयर था। अब यह 7.01 लाख हेक्टेयर रह गया है। 2014-15 की वार्षिक योजना में कुल बजट में कृषि का हिस्सा 1.31 प्रतिशत था। 2015-16 में यह 1.31 प्रतिशत ही रह पाया। जाहिर है कि सरकारी खर्च खेती किसानी पर बेहद कम है।
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खेती के हाशिये पर जाने का असर प्रदेश की सबसे बड़ी वर्क फोर्स पर पड़ा है। 2003 में केवल 7.2 प्रतिशत किसान थे, जिन पर बकाया था। अब बकायेदार किसान 38.27 प्रतिशत है। खेती घाटे में भी है। 2003 में उत्तराखंड में खेती से प्रति किसान की औसत आय 1953 रुपये थी। देश के लिए यह औसत 969 रुपये था। अब प्रदेश में यह औसत 2531 है और देश के लिए 3081 है।
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आपदा से हो रहे नुकसान की भरपाई भी किसानों को खास नहीं हो पा रही है। राज्य गठन के बाद से अब तक कुल 6.41 लाख किसान विभिन्न बीमा योजनाओं के दायरे में आए और इनमें से केवल 1.48 लाख किसानों को ही नुकसान की भरपाई के रूप में 54.31 करोड़ रुपये मिल पाए।
खेती किसानी की यह उपेक्षा पहाड़ और मैदान के बीच की खाई भी बढ़ा रही है। मैदानी जिलों की प्रति व्यक्ति आय एक लाख के आसपास है और 10 पर्वतीय जिलों में प्रति व्यक्ति औसत आय करीब 70 हजार रुपये है। पहाड़ खेती और बागवानी पर निर्भर है और मैदान उद्योग और सेवा क्षेत्र पर।
परंपरागत खेती बचेगी तो होगा विकास
राजनीतिक इच्छा शक्ति के न होने से अलग खेती के परंपरागत स्वरूप को बचाने की कोशिश न होना एक बड़ी वजह है। परंपरागत बीज की जगह बाहर से लाए गए बीज उपयोग में लाए जा रहे हैं। इससे उत्पादकता भी घट रही है और उत्पादन भी कम हो रहा हैै। इसके साथ ही पलायन एक बड़ी समस्या है। पर्वतीय जिलों की अर्थव्यवस्था की रीढ़ खेती किसानी है। मौसम बदलाव के कारण भी अब और बड़ी चुनौती सामने आ रही है।
-डॉ. नंदन एस बिष्ट, अर्थशास्त्री, कुमाऊं विश्वविद्यालय।