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देश में मौजूद हैं वैकल्पिक ऊर्जा कई स्रोत: डॉ.केसी साईं
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नैनीताल। ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों को खोजा जा रहा है लेकिन यह स्रोत सैल गैस, कोल बेट और मिथेन गैस हाइड्रेट भारत में काफी मात्रा में मौजूद हैं। इन स्रोतों को अभी तक छुआ नहीं गया है लेकिन काफी लंबे समय तक ऊर्जा की पूर्ती कर सकते हैं। यह बात वाडिया संस्थान के निदेशक डॉ. कला चंद्र साईं ने सोमवार को कुमाऊं विवि के भूविज्ञान विभाग में आयोजित सेमिनार में कही।
डॉ. साईं ने कहा कि अभी तक कोयला, गैस और हाइड्रो कार्बन का प्रयोग किया जा रहा है और इन पदार्थों से काफी मात्रा में कार्बनडाई ऑक्साइड निकलती है। कहा कि ऊर्जा के उक्त स्रोतों की खपत तो तेजी से हो रही है लेकिन स्रोत नहीं भर पा रहे हैं, जिस कारण इस स्रोतों के कुछ समय बाद समाप्त हो जाने की आशंकाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है। कहा कि सौर और पवन ऊर्जा से भी खपत को पूरा कर पाना विश्व स्तर पर संभव नजर नहीं आ रहा है। कहा कि सैल गैस, कोल बेट और मिथेन गैस हाइड्रेट वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत हो सकते हैं। भारत में इनके काफी मात्रा में होने की संभावन है लेकिन तकनीक उस लिहाज से विकसित नहीं है। कहा कि देश में इन पदार्थों को निकालने के लिए बेहतर तकनीक को विकसित करने की आवश्यकता है, लेकिन इस बात का ध्यान रखने की जरूरत है कि तकनीक से पर्यावरण को किसी प्रकार की हानि न हो। बताया कि देश में महानदी, कृष्णा गोदावरी और अंडमान में गैस हाइड्रेट और खम्बाद की खाड़ी, दामोदर वैली और असम सेल्फ में सैल गैस का अंबार मौजूद हैं। कहा कि इसे लेकर शोध भी किया जा रहा है। कार्यक्रम का संचालन प्रो. बीएस कोटलिया ने किया। इस दौरान डीएसबी परिसर निदेशक प्रो. एलएम जोशी, संकायाध्यक्ष विज्ञान प्रो. गंगा बिष्ट, विभागाध्यक्ष प्रो. जीके शर्मा, डॉ. जेएस मेहता, प्रो. सीसी पंत, डॉ. भारत फुलोरिया, प्रो. प्रदीप गोस्वामी, प्रो. राजीव उपाध्याय आदि थे।
देश में मौजूद हैं वैकल्पिक ऊर्जा कई स्रोत: डॉ. केसी साईं
कुमाऊं विवि के भूविज्ञान विभाग में शुरू हुई दो दिनी कार्यशाला
वैकल्पिक स्रोतों से हो सकती है सौ साल तक ऊर्जा की खपत पूरी
- डॉ. साईं ने कहा कि भारत में सैल गैस, कोल बेट और मिथेन हाइड्रेट मौजूद ऊर्जा स्रोतों की अपेक्षा करीब 1500 गुना अधिक मात्रा में है। संभावना जताते हुए कहा कि इसके मात्र दस फीसदी भाग का प्रयोग करने से देश की ऊर्जा की मांग को सौ सालों तक पूरा किया जा सकता है।
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डॉ. साईं ने कहा कि अभी तक कोयला, गैस और हाइड्रो कार्बन का प्रयोग किया जा रहा है और इन पदार्थों से काफी मात्रा में कार्बनडाई ऑक्साइड निकलती है। कहा कि ऊर्जा के उक्त स्रोतों की खपत तो तेजी से हो रही है लेकिन स्रोत नहीं भर पा रहे हैं, जिस कारण इस स्रोतों के कुछ समय बाद समाप्त हो जाने की आशंकाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है। कहा कि सौर और पवन ऊर्जा से भी खपत को पूरा कर पाना विश्व स्तर पर संभव नजर नहीं आ रहा है। कहा कि सैल गैस, कोल बेट और मिथेन गैस हाइड्रेट वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत हो सकते हैं। भारत में इनके काफी मात्रा में होने की संभावन है लेकिन तकनीक उस लिहाज से विकसित नहीं है। कहा कि देश में इन पदार्थों को निकालने के लिए बेहतर तकनीक को विकसित करने की आवश्यकता है, लेकिन इस बात का ध्यान रखने की जरूरत है कि तकनीक से पर्यावरण को किसी प्रकार की हानि न हो। बताया कि देश में महानदी, कृष्णा गोदावरी और अंडमान में गैस हाइड्रेट और खम्बाद की खाड़ी, दामोदर वैली और असम सेल्फ में सैल गैस का अंबार मौजूद हैं। कहा कि इसे लेकर शोध भी किया जा रहा है। कार्यक्रम का संचालन प्रो. बीएस कोटलिया ने किया। इस दौरान डीएसबी परिसर निदेशक प्रो. एलएम जोशी, संकायाध्यक्ष विज्ञान प्रो. गंगा बिष्ट, विभागाध्यक्ष प्रो. जीके शर्मा, डॉ. जेएस मेहता, प्रो. सीसी पंत, डॉ. भारत फुलोरिया, प्रो. प्रदीप गोस्वामी, प्रो. राजीव उपाध्याय आदि थे।
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कुमाऊं विवि के भूविज्ञान विभाग में शुरू हुई दो दिनी कार्यशाला
वैकल्पिक स्रोतों से हो सकती है सौ साल तक ऊर्जा की खपत पूरी
- डॉ. साईं ने कहा कि भारत में सैल गैस, कोल बेट और मिथेन हाइड्रेट मौजूद ऊर्जा स्रोतों की अपेक्षा करीब 1500 गुना अधिक मात्रा में है। संभावना जताते हुए कहा कि इसके मात्र दस फीसदी भाग का प्रयोग करने से देश की ऊर्जा की मांग को सौ सालों तक पूरा किया जा सकता है।
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