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स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की पुण्य तिथि मनाने तक की नहीं है लोगों को फुर्सत
Updated Mon, 31 Jul 2017 11:07 PM IST
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रानीखेत (अल्मोड़ा)। आजादी की लड़ाई में अंग्रेज हुक्मरानों की नाक में दम करने वाले महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. पं. मदन मोहन उपाध्याय की कल एक अगस्त को 38वीं पुण्य तिथि है, लेकिन शहर में कहीं भी बड़े स्तर पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की पुण्य तिथि तक नहीं मनाई जाती। अलबत्ता गत वर्ष सरकार ने जरूर द्वाराहाट पीजी कालेज का नाम स्व. उपाध्याय के नाम पर किया है। स्व. उपाध्याय के आंदोलनों से परेशान अंग्रेज जब उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सके तो उन्होंने स्व. उपाध्याय पर उस समय 10 हजार रुपये का इनाम तक घोषित कर दिया था।
स्व. उपाध्याय का जन्म 1910 में द्वाराहाट के बमनपुरी गांव में हुआ। देश भक्ति का जज्बा बचपन से ही उनमें भरा था। 1915 में वह रानीखेत आ गए थे। कालेज के दिनों में भी उन्होंने जमकर अंग्रेजों की खिलाफत की। भारत छोड़ो आंदोलन के तहत 1921 में महात्मा गांधी के ताड़ीखेत दौरे के बाद स्व. उपाध्याय में आजादी का ऐसा जुनून जागा कि उन्होंने पूरे उपमंडल क्षेत्र में आंदोलनों के माध्यम से डेढ़ दशक तक अंग्रेजों की नींद उड़ा दी। 1945 में अंग्रेजों ने उनकी गिरफ्तारी के लिए 10 हजार का इनाम घोषित कर दिया, लेकिन वह गिरफ्तार नहीं हुए। स्व. उपाध्याय 1952 में रानीखेत-द्वाराहाट क्षेत्र से विधायक भी चुने गए। एक अगस्त 1978 को उनकी मृत्यु हो गई, लेकिन शहर में उनकी पुण्य तिथि मनाने का भी लोगों को समय नहीं है।
घाघरा, पिछौड़ा पहनकर देते थे अंग्रेजों का चकमा
रानीखेत। स्व. उपाध्याय अंग्रेजों की आंखों में धूल झोंकते रहे। उनके पुत्र हिमांशु उपाध्याय बताते हैं कि 1946 में अंग्रेजों को उनके जरूरी बाजार में होने की भनक लगी तो रात में उस घर में दबिश दी गई जहां वह ठहरे थे, लेकिन उपाध्याय घाघरा और पिछौड़ा ओढ़कर चुपचाप बाहर निकल गए।
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स्व. उपाध्याय का जन्म 1910 में द्वाराहाट के बमनपुरी गांव में हुआ। देश भक्ति का जज्बा बचपन से ही उनमें भरा था। 1915 में वह रानीखेत आ गए थे। कालेज के दिनों में भी उन्होंने जमकर अंग्रेजों की खिलाफत की। भारत छोड़ो आंदोलन के तहत 1921 में महात्मा गांधी के ताड़ीखेत दौरे के बाद स्व. उपाध्याय में आजादी का ऐसा जुनून जागा कि उन्होंने पूरे उपमंडल क्षेत्र में आंदोलनों के माध्यम से डेढ़ दशक तक अंग्रेजों की नींद उड़ा दी। 1945 में अंग्रेजों ने उनकी गिरफ्तारी के लिए 10 हजार का इनाम घोषित कर दिया, लेकिन वह गिरफ्तार नहीं हुए। स्व. उपाध्याय 1952 में रानीखेत-द्वाराहाट क्षेत्र से विधायक भी चुने गए। एक अगस्त 1978 को उनकी मृत्यु हो गई, लेकिन शहर में उनकी पुण्य तिथि मनाने का भी लोगों को समय नहीं है।
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घाघरा, पिछौड़ा पहनकर देते थे अंग्रेजों का चकमा
रानीखेत। स्व. उपाध्याय अंग्रेजों की आंखों में धूल झोंकते रहे। उनके पुत्र हिमांशु उपाध्याय बताते हैं कि 1946 में अंग्रेजों को उनके जरूरी बाजार में होने की भनक लगी तो रात में उस घर में दबिश दी गई जहां वह ठहरे थे, लेकिन उपाध्याय घाघरा और पिछौड़ा ओढ़कर चुपचाप बाहर निकल गए।
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