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गैंगरेप मामले में दो युवक दोषी पाए गए
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हल्द्वानी। वह बोल नहीं सकती थी इसलिए अपने साथ हुए गलत काम को बयान नहीं कर सकी। लेकिन कोर्ट ने सीसीटीवी फुटेज और डीएनए जांच के आधार पर दो युवकों को गैंगरेप का दोषी पाया। अदालत के सजा के बिंदु पर मंगलवार को फैसला सुनाएगी।
जिला सहायक शासकीय अधिवक्ता घनश्याम पंत के अनुसार सात मार्च 2018 की बोलने में अक्षम युवती घर से लापता हो गई। उसके भाई ने गुमशुदगी दर्ज कराने के बाद हिमालयन फार्म की सीसीटीवी फुटेज देखी तो पता चला कि उसे दो लोग पकड़कर ले जा रहे हैं। देर रात लड़की पेट्रोल पंप के पास बरामद की गई। उसके कपड़ों पर खून लगा था। लड़की ने इशारों में बताया कि उसे दो लोग लेकर आए थे। गलत काम करने के बाद उन्होंने मारपीट की थी। पुलिस ने फुटेज के आधार पर आरोपियों की पहचान बुलंदशहर (यूपी) के गालमपुर डिबाई निवासी मूलचंद उर्फ मूला और अलीगढ़ के छर्रा निवासी भूप सिंह उर्फ भुपाली के रूप में की। दोनों बनभूलपुरा क्षेत्र में मजदूरी करने के लिए आए थे। पुलिस ने दोनों के खिलाफ बनभूलपुरा थाने में दुष्कर्म, पॉक्सो, अपहरण सहित अन्य धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया। मुकदमे की विवेचना उपनिरीक्षक कुमकुम धानिक ने की। पुलिस ने युवती का मेडिकल मुआयना कराने के बाद धारा 164 के तहत अदालत में बयान दर्ज कराने का प्रयास किया लेकिन लड़की बोलने में सक्षम नहीं थी, इस कारण बयान नहीं हो सका। पुलिस ने बयान दर्ज करने के लिए मानसिक चिकित्सक डॉ. श्रद्धा कांडपाल का सहयोग लिया और सीसीटीवी फुटेज की सीडी बनाकर उसे कोर्ट में पेश किया। युवती और मुल्जिम के कपड़ों में लगे खून और अन्य अवयव डीएनए जांच में मैच कर गए। शासकीय अधिवक्ता ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की एक नजीर पेश की। बताया कि सुुप्रीम कोर्ट ने कहा है ऐसे मामले में पीड़िता का बयान लेना जरूरी नहीं है। अपर सत्र न्यायाधीश (द्वितीय) मो. सुलतान की अदालत ने दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने और साक्ष्यों का अवलोकन करने के बाद दोनों आरोपियों को धारा 363, 366 ए, 376 (घ) का दोषी पाया। इस मामले में कोर्ट मुहर्रिर नरेंद्र सिंह गवाहों को बुलाने में अहम भूमिका निभाई।
गैंगरेप में दो युवक दोषी पाए गए
सजा के बिंदु पर सुनवाई आज होगी, दिव्यांग युवती के साथ पिछले साल हुई थी घटना
डीएनए बना अहम साक्ष्य
हल्द्वानी। शासकीय अधिवक्ता घनश्याम पंत ने बताया कि मुकदमे में डीएनए और सीसीटीवी फुटेज अहम साक्ष्य थे। युवती और अभियुक्त के कपड़े से बरामद अवयव डीएनए में मैच कर गया था। इसी कारण अभियुक्तों की गर्दन फंस गई। अदालत एक साल से अंदर फैसला सुनाने के बिंदु तक पहुंचने में सफल रही।
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जिला सहायक शासकीय अधिवक्ता घनश्याम पंत के अनुसार सात मार्च 2018 की बोलने में अक्षम युवती घर से लापता हो गई। उसके भाई ने गुमशुदगी दर्ज कराने के बाद हिमालयन फार्म की सीसीटीवी फुटेज देखी तो पता चला कि उसे दो लोग पकड़कर ले जा रहे हैं। देर रात लड़की पेट्रोल पंप के पास बरामद की गई। उसके कपड़ों पर खून लगा था। लड़की ने इशारों में बताया कि उसे दो लोग लेकर आए थे। गलत काम करने के बाद उन्होंने मारपीट की थी। पुलिस ने फुटेज के आधार पर आरोपियों की पहचान बुलंदशहर (यूपी) के गालमपुर डिबाई निवासी मूलचंद उर्फ मूला और अलीगढ़ के छर्रा निवासी भूप सिंह उर्फ भुपाली के रूप में की। दोनों बनभूलपुरा क्षेत्र में मजदूरी करने के लिए आए थे। पुलिस ने दोनों के खिलाफ बनभूलपुरा थाने में दुष्कर्म, पॉक्सो, अपहरण सहित अन्य धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया। मुकदमे की विवेचना उपनिरीक्षक कुमकुम धानिक ने की। पुलिस ने युवती का मेडिकल मुआयना कराने के बाद धारा 164 के तहत अदालत में बयान दर्ज कराने का प्रयास किया लेकिन लड़की बोलने में सक्षम नहीं थी, इस कारण बयान नहीं हो सका। पुलिस ने बयान दर्ज करने के लिए मानसिक चिकित्सक डॉ. श्रद्धा कांडपाल का सहयोग लिया और सीसीटीवी फुटेज की सीडी बनाकर उसे कोर्ट में पेश किया। युवती और मुल्जिम के कपड़ों में लगे खून और अन्य अवयव डीएनए जांच में मैच कर गए। शासकीय अधिवक्ता ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की एक नजीर पेश की। बताया कि सुुप्रीम कोर्ट ने कहा है ऐसे मामले में पीड़िता का बयान लेना जरूरी नहीं है। अपर सत्र न्यायाधीश (द्वितीय) मो. सुलतान की अदालत ने दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने और साक्ष्यों का अवलोकन करने के बाद दोनों आरोपियों को धारा 363, 366 ए, 376 (घ) का दोषी पाया। इस मामले में कोर्ट मुहर्रिर नरेंद्र सिंह गवाहों को बुलाने में अहम भूमिका निभाई।
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गैंगरेप में दो युवक दोषी पाए गए
सजा के बिंदु पर सुनवाई आज होगी, दिव्यांग युवती के साथ पिछले साल हुई थी घटना
डीएनए बना अहम साक्ष्य
हल्द्वानी। शासकीय अधिवक्ता घनश्याम पंत ने बताया कि मुकदमे में डीएनए और सीसीटीवी फुटेज अहम साक्ष्य थे। युवती और अभियुक्त के कपड़े से बरामद अवयव डीएनए में मैच कर गया था। इसी कारण अभियुक्तों की गर्दन फंस गई। अदालत एक साल से अंदर फैसला सुनाने के बिंदु तक पहुंचने में सफल रही।
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