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जलवायु परिवर्तन पारिस्थितिकी के लिए खतरा
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नैनीताल। जलवायु परिवर्तन हिमालयी क्षेत्रों के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा बन रहा है। मैदानी क्षेत्रों की अपेक्षा हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन का दोगुना असर देखने को मिल रहा है, इसके चलते मध्य हिमालयी क्षेत्र में एक ओर औसत वर्षा में कमी आ रही है, वहीं मौसम चक्र में परिवर्तन से यहां की कृषि और फलोत्पादन में भी इसका दुष्प्रभाव पड़ रहा है।
कुविवि की ओर से जलवायु परिवर्तन पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला में पहुंचे वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्रों में तापमान बढ़ने से क्षेत्र के जलस्रोतों पर असर पड़ रहा है। जलस्रोतों की संख्या में भी लगातार कमी आ रही है। इस कारण वहां की वनस्पतियों और जैव विविधता के लिए भी संकट उत्पन्न हो गया है। वैज्ञानिकों का मत है कि हानिकारक गैसों के उत्सर्जन और प्रदूषण को कम कर कुछ हद तक जलवायु परिवर्तन रोका जा सकता है।
जलवायु परिवर्तन पारिस्थितिकी के लिए खतरा
वैज्ञानिक बोले, हिमालयी क्षेत्रों में दोगुनी गति से बढ़ रहा है तापमान
शोधों से पता चला है कि जलवायु परिवर्तन और तापमान बढ़ने से जैव संरक्षित क्षेत्रों में संरक्षित की जा रही वनस्पतियां भी अपना स्थान परिवर्तित कर ऊंचाई की ओर उन्मुख होने लगी है, जो कि पारिस्थितिकी के लिए शुभ संकेत नहीं है। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में भी परिवर्तन आ रहे हैं, परिवर्तन के आधार पर लोगों को अनुकूलित करना जरूरी है, इसके लिए लोगों को जागरूक कर इसे नियंत्रित किया जा सकता है। -डॉ.आरएस रावल, डॉयरेक्टर जीबी पंत हिमालयी पर्यावरण एवं विकास संस्थान अल्मोड़ा।
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तापमान में हो रही वृद्धि से ग्लेशियरों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है पिछले 50 वर्षों के शोध के अनुसार गंगोत्री ग्लेशियर अपने स्थान से 900 मीटर पीछे खिसक गया है, इसका सीधा असर मध्य हिमालयी क्षेत्र की पानी की आपूर्ति पर भी पड़ रहा है। अगर इसी गति से ग्लेशियर पिघलते रहे तो सदानीरा रहने वाली नदियों में भविष्य में सूखे की स्थिति आ सकती है। -डॉ.भाष्कर निकम, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ रिमोट सेंसिंग देहरादून
उनका विभाग आठ वर्षों से यूके के एक विवि के साथ मिलकर एक प्रोजेक्ट पर कार्य कर रहा है, इसमें रामगढ़ विकासखंड में पानी पर शोध कार्य किया जा रहा है। क्षेत्र में जल स्तर लगातार गिर रहा है। शोध से संकेत मिल रहे हैं कि पिछले 15 वर्षों में क्षेत्र में शीतकालीन और वसंतकालीन सूखा पड़ रहा है। क्षेत्र में वार्षिक वर्षा का औसत 11 प्रतिशत तक कम हो गया है। पूर्व में साल भर में करीब 66 दिन वर्षा होती थी, जो कि घटकर 55 दिन रह गई है। इसका सबसे प्रतिकूल प्रभाव क्षेत्र के किसानों पर पड़ा है। क्षेत्र में 35 प्रतिशत तक फल और सब्जी उत्पादन में कमी आ गई है। -प्रो.पीसी तिवारी, विभागाध्यक्ष डीएसबी परिसर नैनीताल
आबादी के दबाव और शहरीकरण के कारण विश्व भर में झरनों का पानी घट रहा है, इसका प्रभाव झीलों, नदियों और भूजल पर भी पड़ रहा है। उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य में स्थिति और भी चिंताजनक है, क्योंकि यहां खेती और पेयजल के लिए अधिकतर लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से झरनों पर निर्भर हैं। यदि सामाजिक भागीदारी से जल स्रोतों को बचाने और विकसित करने के गंभीर प्रयास नहीं किए गए तो भविष्य में स्थिति बहुत बिगड़ सकती है। -डॉ. संतोष मुरलीधर पिंगले, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी रुड़की
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कुविवि की ओर से जलवायु परिवर्तन पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला में पहुंचे वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्रों में तापमान बढ़ने से क्षेत्र के जलस्रोतों पर असर पड़ रहा है। जलस्रोतों की संख्या में भी लगातार कमी आ रही है। इस कारण वहां की वनस्पतियों और जैव विविधता के लिए भी संकट उत्पन्न हो गया है। वैज्ञानिकों का मत है कि हानिकारक गैसों के उत्सर्जन और प्रदूषण को कम कर कुछ हद तक जलवायु परिवर्तन रोका जा सकता है।
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जलवायु परिवर्तन पारिस्थितिकी के लिए खतरा
वैज्ञानिक बोले, हिमालयी क्षेत्रों में दोगुनी गति से बढ़ रहा है तापमान
शोधों से पता चला है कि जलवायु परिवर्तन और तापमान बढ़ने से जैव संरक्षित क्षेत्रों में संरक्षित की जा रही वनस्पतियां भी अपना स्थान परिवर्तित कर ऊंचाई की ओर उन्मुख होने लगी है, जो कि पारिस्थितिकी के लिए शुभ संकेत नहीं है। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में भी परिवर्तन आ रहे हैं, परिवर्तन के आधार पर लोगों को अनुकूलित करना जरूरी है, इसके लिए लोगों को जागरूक कर इसे नियंत्रित किया जा सकता है। -डॉ.आरएस रावल, डॉयरेक्टर जीबी पंत हिमालयी पर्यावरण एवं विकास संस्थान अल्मोड़ा।
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तापमान में हो रही वृद्धि से ग्लेशियरों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है पिछले 50 वर्षों के शोध के अनुसार गंगोत्री ग्लेशियर अपने स्थान से 900 मीटर पीछे खिसक गया है, इसका सीधा असर मध्य हिमालयी क्षेत्र की पानी की आपूर्ति पर भी पड़ रहा है। अगर इसी गति से ग्लेशियर पिघलते रहे तो सदानीरा रहने वाली नदियों में भविष्य में सूखे की स्थिति आ सकती है। -डॉ.भाष्कर निकम, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ रिमोट सेंसिंग देहरादून
उनका विभाग आठ वर्षों से यूके के एक विवि के साथ मिलकर एक प्रोजेक्ट पर कार्य कर रहा है, इसमें रामगढ़ विकासखंड में पानी पर शोध कार्य किया जा रहा है। क्षेत्र में जल स्तर लगातार गिर रहा है। शोध से संकेत मिल रहे हैं कि पिछले 15 वर्षों में क्षेत्र में शीतकालीन और वसंतकालीन सूखा पड़ रहा है। क्षेत्र में वार्षिक वर्षा का औसत 11 प्रतिशत तक कम हो गया है। पूर्व में साल भर में करीब 66 दिन वर्षा होती थी, जो कि घटकर 55 दिन रह गई है। इसका सबसे प्रतिकूल प्रभाव क्षेत्र के किसानों पर पड़ा है। क्षेत्र में 35 प्रतिशत तक फल और सब्जी उत्पादन में कमी आ गई है। -प्रो.पीसी तिवारी, विभागाध्यक्ष डीएसबी परिसर नैनीताल
आबादी के दबाव और शहरीकरण के कारण विश्व भर में झरनों का पानी घट रहा है, इसका प्रभाव झीलों, नदियों और भूजल पर भी पड़ रहा है। उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य में स्थिति और भी चिंताजनक है, क्योंकि यहां खेती और पेयजल के लिए अधिकतर लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से झरनों पर निर्भर हैं। यदि सामाजिक भागीदारी से जल स्रोतों को बचाने और विकसित करने के गंभीर प्रयास नहीं किए गए तो भविष्य में स्थिति बहुत बिगड़ सकती है। -डॉ. संतोष मुरलीधर पिंगले, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी रुड़की