{"_id":"5a440abc4f1c1b193e8bb3c3","slug":"131514408636-nainital-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"महिलाओं को किसान का दर्जा तो दो","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
महिलाओं को किसान का दर्जा तो दो
Updated Thu, 28 Dec 2017 02:33 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हल्द्वानी। यहां एकत्रित प्रदेश भर के महिला संगठनों के प्रतिनिधियों ने साफ कहा कि प्रदेश में महिलाओं को पहले किसान का दर्जा दिया जाना चाहिए। पहाड़ में खेती महिलाओं के दम पर चलती हैं, लेकिन एक भी महिला के नाम पर खेत नहीं हैं। कानून उसी को किसान मानता है जिसकेनाम पर खेत हैं।
खेती और महिला किसान सत्र का संचालन करते हुए चंद्रकला ने कहा कि पहाड़ों में महिलाओं को किसान तो कहा जाता है लेकिन उन्हें वैधानिक रूप से किसान का दर्जा नहीं दिया जाता। खेती महिलाएं करती हैं और खेती के मामले में फैसला उनका अपना नहीं होता। महिला एकता परिषद की मधुबाला कांडपाल ने कहा कि पलायन इतना बढ़ गया है कि गांवों में अब वे ही हैं जो खेती पर निर्भर हैं। प्रतिनिधियों ने कहा कि महिलाओं को भी संपत्ति का अधिकार वास्तविक रूप से मिलना चाहिए। वे मायके और ससुराल के बीच में भी उलझ कर रह जाती हैं।
कहा गया कि पहाड़ों में जबरन हाइब्रिड बीज थोपे जा रहे हैं। इन बीजों से खेती बढ़ने की बजाय घट रही है। बंदर, लंगूर और जंगली सुअर खेतों को तबाह कर रहे हैं और किसी के पास कोई समाधान नहीं हैं।
विज्ञापन
उमंग की प्रतिनिधि सुनीता ने कहा कि 22 राज्यों में अब महिला किसानों का संगठन फैल चुका है। संगठित होकर महिला किसान अपने हक की बात कर रही हैं। वनराजियों के लिए लागू भूमि कानून को अमली जामा न पहनाए जाने की शिकायत एक प्रतिनिधि ने की। तय किया गया कि सम्मेलन में खेतों पर महिलाओं के मालिकाना हक की मांग का प्रस्ताव पारित किया जाएगा।
विज्ञापन
खेती और महिला किसान सत्र का संचालन करते हुए चंद्रकला ने कहा कि पहाड़ों में महिलाओं को किसान तो कहा जाता है लेकिन उन्हें वैधानिक रूप से किसान का दर्जा नहीं दिया जाता। खेती महिलाएं करती हैं और खेती के मामले में फैसला उनका अपना नहीं होता। महिला एकता परिषद की मधुबाला कांडपाल ने कहा कि पलायन इतना बढ़ गया है कि गांवों में अब वे ही हैं जो खेती पर निर्भर हैं। प्रतिनिधियों ने कहा कि महिलाओं को भी संपत्ति का अधिकार वास्तविक रूप से मिलना चाहिए। वे मायके और ससुराल के बीच में भी उलझ कर रह जाती हैं।
विज्ञापन
कहा गया कि पहाड़ों में जबरन हाइब्रिड बीज थोपे जा रहे हैं। इन बीजों से खेती बढ़ने की बजाय घट रही है। बंदर, लंगूर और जंगली सुअर खेतों को तबाह कर रहे हैं और किसी के पास कोई समाधान नहीं हैं।
विज्ञापन
उमंग की प्रतिनिधि सुनीता ने कहा कि 22 राज्यों में अब महिला किसानों का संगठन फैल चुका है। संगठित होकर महिला किसान अपने हक की बात कर रही हैं। वनराजियों के लिए लागू भूमि कानून को अमली जामा न पहनाए जाने की शिकायत एक प्रतिनिधि ने की। तय किया गया कि सम्मेलन में खेतों पर महिलाओं के मालिकाना हक की मांग का प्रस्ताव पारित किया जाएगा।