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50 साल बाद मिला जंगल की सेहत का ‘थर्मामीटर’
Updated Tue, 22 May 2018 02:33 AM IST
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घना जंगल
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हल्द्वानी। उत्तराखंड के जंगलों की सेहत पर निगरानी रखने के तरीके को अब 50 साल बाद भी वन विभाग अपना रहा है। 1968 के बाद से अपने हाल पर छोड़ दिए गए परिरक्षित क्षेत्रों (प्रिजर्व प्लाट) को अब वन विभाग ने खोज निकाला है। वन अनुसंधान केंद्र हल्द्वानी का मानना है कि जैव विविधता में हो रहे बदलाव को मापने का यह कारगर तरीका था।
प्रांतीय वन सेवा के तहत 1928 से 1953 तक कुमाऊं और गढ़वाल के अलग-अलग जंगलों में 21 परिरक्षित क्षेत्र घोषित किए गए थे। ये क्षेत्र जैव विविधता से भरपूर थे। उस समय साफ निर्देश थे कि परिरक्षित क्षेत्रों में कोई भी छेड़छाड़, वानिकी, गैर वानिकी काम नहीं होंगे। सिर्फ इन क्षेत्रों में साल दर साल वनस्पतियों में हो रहे बदलाव की देखरेख की जाएगी। इसके पीछे मंशा जंगल में जैव विविधता में हो रहे बदलाव के ‘रियल चेक’ की थी।
आजादी के बाद वन विभाग ने 1968 तक इन परिरक्षित क्षेत्रों को मानीटर किया गया। इसके बाद इन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया गया। 1928 के बाद से 1968 तक हर साल इन परिरक्षित क्षेत्रों में वनस्पतियों की स्थिति, पेड़ों में हो रहे बदलाव, उनकी ग्रोथ आदि का रिकार्ड रखा जाता रहा।
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1968 के बाद इन परिरक्षित क्षेत्रों को भुला दिया गया और इससे संबंधित रिकार्ड की भी सुध नहीं ली गई। अब 50 साल बाद वन अनुसंधान केंद्र एक बार फिर इन परिरक्षित क्षेत्रों की देखरेख करने जा रहा है। वन अनुसंधान केंद्र ने देहरादून, हल्द्वानी, तराई, राजाजी पार्क, रामनगर, जिम कार्बेट पार्क में इन प्लाटों को खोज लिया है।
- वन विभाग ने खोज निकाले 21 परिरक्षित क्षेत्र
- 1928 में जंगल में हो रहे बदलाव की देखरेख के लिए अपनाया था तरीका
- 1968 तक जारी रही रिकार्ड कीपिंग, अब वन अनुसंधान केंद्र करेगा निगरानी
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प्रांतीय वन सेवा के तहत 1928 से 1953 तक कुमाऊं और गढ़वाल के अलग-अलग जंगलों में 21 परिरक्षित क्षेत्र घोषित किए गए थे। ये क्षेत्र जैव विविधता से भरपूर थे। उस समय साफ निर्देश थे कि परिरक्षित क्षेत्रों में कोई भी छेड़छाड़, वानिकी, गैर वानिकी काम नहीं होंगे। सिर्फ इन क्षेत्रों में साल दर साल वनस्पतियों में हो रहे बदलाव की देखरेख की जाएगी। इसके पीछे मंशा जंगल में जैव विविधता में हो रहे बदलाव के ‘रियल चेक’ की थी।
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आजादी के बाद वन विभाग ने 1968 तक इन परिरक्षित क्षेत्रों को मानीटर किया गया। इसके बाद इन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया गया। 1928 के बाद से 1968 तक हर साल इन परिरक्षित क्षेत्रों में वनस्पतियों की स्थिति, पेड़ों में हो रहे बदलाव, उनकी ग्रोथ आदि का रिकार्ड रखा जाता रहा।
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1968 के बाद इन परिरक्षित क्षेत्रों को भुला दिया गया और इससे संबंधित रिकार्ड की भी सुध नहीं ली गई। अब 50 साल बाद वन अनुसंधान केंद्र एक बार फिर इन परिरक्षित क्षेत्रों की देखरेख करने जा रहा है। वन अनुसंधान केंद्र ने देहरादून, हल्द्वानी, तराई, राजाजी पार्क, रामनगर, जिम कार्बेट पार्क में इन प्लाटों को खोज लिया है।
- वन विभाग ने खोज निकाले 21 परिरक्षित क्षेत्र
- 1928 में जंगल में हो रहे बदलाव की देखरेख के लिए अपनाया था तरीका
- 1968 तक जारी रही रिकार्ड कीपिंग, अब वन अनुसंधान केंद्र करेगा निगरानी