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उत्तराखंडः चारधाम के यह रहस्य जानकर भगवान पर बढ़ेगा विश्वास

Wed, 24 Aug 2016 12:03 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून Updated Wed, 24 Aug 2016 12:03 PM IST
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mythological story behind char dham
- फोटो : file photo

उत्तराखंड में पवित्र चारधाम अपने में कई रहस्य छुपाए हुए हैं। आइए जानते हैं इन रहस्यों के बारे में...

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केदारनाथ धाम
12 ज्योतिर्लिंगों में ये केदार एकादश ज्योतिर्लिंग के नाम से विख्यात है। मान्यता है कि गोत्र हत्या के पाप से मुक्ति के लिए जब पांडव भगवान शिव के दर्शन के लिए यहां आए, तो शिव उन्हें दर्शन नहीं देना चाहते थे। इस वजह से शिव भैंसे का रूप धारण करके इधर-उधर घूमने लगे, ताकि पांडव उन्हें पहचान ना पाएं।

महिष रूप धारी शिव एक जगह से जमीन में समाने लगे तो भीम ने उनकी पूंछ पकड़ ली। भगवान का पृष्ठ भाग केदारनाथ में प्रकट हुआ। यहां शिव के इसी भाग की पूजा की जाती है। मान्यता है कि आदि गुरु शंकराचार्य भी यहां से होकर स्वर्ग गए थे। 
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श्री बदरीनाथ धाम 
यह भगवान विष्णु के अवतार नर-नारायण की तपो भूमि है। हिमालय की तलहटी पर बसे बदरीनाथ धाम को भू-बैकुंठ भी कहा जाता है। बदरीकाश्रम यानि बदरी सदृशं तीर्थम, न भूतो न भविष्यति। अर्थात बदरीनाथ जैसा स्थान मृत्युलोक पर न पहले था और न भविष्य में होगा। माना जाता है कि यहां विष्णु भगवान तपस्यारत हैं।
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विष्णु भगवान ने इस मृत्यलोक में 12 बार अवतार लिया और कर्म करके चले गए। बदरीनाथ धाम में स्थित ब्रह्म कपाली में पितरों को तर्पण देने से व्यक्ति को सात जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है। उसका जीवन सफल हो जाता है।

जानिए इन धामों का धार्मिक महत्व

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गंगा

गंगोत्री
अपने पूर्वजों को श्रापमुक्त करने के लिए राजा भगीरथ ने यहीं पर तपस्या की थी। गंगा का स्वर्ग से धरती पर अवतरण यहीं पर माना जाता है। माना जाता है कि राजा भगीरथ ने अपने पुरखों के उद्धार के लिए एक पैर पर खड़े रहकर 5,500 वर्षों तक यहां पर तपस्या की थी।

मान्यता है कि यहां उत्तरमुखी बहने वाली गंगा भागीरथी जी के दर्शन, स्नान, आचमन तथा पूजा-अर्चना से मनुष्य को पापों से मुक्ति मिलती है। गंगा स्वर्गलोक से पृथ्वी लोक में उतरती है। जीवन की अवधि समाप्त होने पर पृथ्वी से स्वर्गलोक ले जाने वाली भी गंगा को ही माना गया है।

यमुनोत्री
चार धाम यात्रा का पहला तीर्थ यमुनोत्री को माना जाता है। कहा जाता है कि यमुनोत्री धाम के कपाट खुलने वाले दिन अक्षय तृतीया को भगवान कृष्ण ने सूर्यपुत्री यमुना का वरण किया था। सूर्य पुत्री तथा शनि और यमराज की बहन यमुना मनुष्य को ग्रहजनित कष्टों से मुक्ति दिलाने वाली मानी जाती हैं।

प्राचीन धर्मशास्त्रों में कलियुग में यदि कोई मनुष्य यमुनोत्री तीर्थ की यात्रा करके मां यमुना का पूजन, दर्शन तथा यमुना जल में स्नान और उसका आचमन करता है, तो उसे शनि और यम का भय कभी नहीं सताता है। यहां दिव्य शिला के स्पर्श का भी महत्व है।

सुकून चाहिए, तो यहां भी आइए

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तुंगनाथ - फोटो : amar ujala

बाबा केदार के दर्शन करने वाले श्रद्धालु द्वितीय केदार श्रीमद्महेश्वर धाम और तृतीय केदार तुंगनाथ धाम के भी दर्शन कर सकते हैं। द्वितीय केदार मद्महेश्वर धाम के दर्शन के लिए रुद्रप्रयाग-गौरीकुंड राजमार्ग से ऊखीमठ और वहां से रांसी पहुंचना होता है।

इसके बाद यहां से 18 किमी पैदल दूरी तय कर धाम पहुंचा जाता है। इस वर्ष मद्महेश्वर धाम के कपाट 11 मई को खुल रहे हैं। जबकि तृतीय केदार तुंगनाथ धाम पहुंचने के लिए ऊखीमठ-मंडल-गोपेश्वर राजमार्ग से चोपता पहुंचना होता है। यहां से करीब साढ़े तीन किमी की पैदल दूरी कर धाम पहुंचा जाता है। इस वर्ष यहां 20 मई को कपाट खुलेंगे।

योगबदरी मंदिर, पांडुकेश्वर
भविष्य बदरी, सुंभाई
नृसिंह मंदिर, वासुदेव मंदिर जोशीमठ
ध्यान बदरी, उरगम
आदि बदरी
विश्वनाथ मंदिर गुप्तकाशी
मद्महेश्वर मंदिर, मद्महेश्वर
महाकाली मंदिर, कालीमठ
नारायण मंदिर, त्रिजुगीनारायण
तुंगनाथ मंदिर, तुंगनाथ
कालीशिला
धारी देवी मंदिर-श्रीनगर
संगम स्थल, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, नंदप्रयाग, विष्णुप्रयाग, देवप्रयाग
रुघुनाथ मंदिर, देवप्रयाग
अनसुया मंदिर-गोपेश्वर

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