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Kotdwar News: पौड़ी की ऐतिहासिक रामलीला का इस वर्ष होगा 125वां मंचन
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पौड़ी। सांस्कृतिक नगरी पौड़ी में सोमवार से शुरू होने जा रही ऐतिहासिक रामलीला का इस वर्ष 125वां मंचन होगा। 125 साल पुरानी रामलीला में कई उतार-चढ़ाव आ चुके हैं। समय बदला तो पौड़ी की रामलीला भी समय के साथ अपडेट होती चली गई। हालांकि अब तकनीक के उच्चतम शिखर पर रामलीला जैसे मंचों तक दर्शकों को खींच लाना किसी चुनौती से कम नहीं।जिला मुख्यालय पौड़ी में रामलीला का मंचन सर्वप्रथम 1897 में डॉ. भोलादत्त काला और अधिवक्ता बृजमोहन चंदोला के संयुक्त प्रयासों से हुआ। जबकि 1906 से रामलीला के प्रमाणित दस्तावेज मिलते हैं। रामलीला समिति की ओर से 2013 में नमामि रामम स्मारिका प्रकाशित हुई। जिसमें 1897 से शुरू हुई रामलीला मानी जाती है। प्राचीन मंचनों का संग्रह जुटा रहे वरिष्ठ शिक्षाविद धीरेंद्र खंकरियाल बताते हैं कि 1910 में प्रकाशित पत्रिका गढ़वाल मासिक में भी 1906 में हुई रामलीला का उल्लेख है। बताया कि 1920 में रामलीला मंचन में इस्तेमाल होने वाला परशुराम का फरसा आज भी स्थानीय प्रशांत नेगी के पास है।
ब्रिटिश गढ़वाल में पौड़ी की रामलीला की बढ़ती लोकप्रियता के चलते इसे पारसी थिएटर में तब्दील किया गया। 1993 में पारसी रंगमंच की तर्ज पर पौड़ी की रामलीला प्रचलित होकर एक प्रभावशाली नाट्य परंपरा बनती चली गई। अब पौड़ी रामलीला के रंगमंच में प्रोसेनियम मंच, चित्रमय पर्दे और मंच प्रभाव को शामिल किया गया। जो कि दर्शकों को बांधे रखने के लिए कर्णप्रिय संगीत, नृत्य और हास्य प्रस्तुतियाें का मिश्रण प्रस्तुत करते थे।
गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी भी रामलीला मंच में जुड़े रहे
लंबे समय से रामलीला मंचन का संचालन कर रहे शिक्षाविद विरेंद्र खंकरियाल बताते हैं कि गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी भी रामलीला के कई यादगार किरदार निभाया करते थे। पौड़ीगांव में जन्मे नेगी बाल्यकाल से लेकर युवावस्था तक कई बार भरत, शत्रुघ्न व अहिल्या के साथ ही वानर सेना में शामिल होते। वहीं शुरुआती दौर में कई मुस्लिम युवकों ने भी रामलीला में प्रमुख किरदार निभाए। जिसमें मो. सद्दीक कुंभकर्ण व मो. यासीन लक्ष्मण बने जबकि ईसाई समुदाय के विक्टर भी सुषैण वैद्य के किरदार निभाया करते थे।
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गणेश वंदना की जगह गूंजे स्वतंत्रता की गीत
1947 में देश की आजादी के समय पौड़ी रामलीला भी पूरी तरह से आजादी के रंग में रंग गई। रामलीला के पारंपरिक वंदना की जगह मथुरा प्रसाद डोभाल रचित स्वतंत्र भारत पुण्य भूमि में रामराज आया गीत को वंदना स्वरूप प्रस्तुत किया गया। वहीं स्वतंत्रता के बाद हुई रामलीला के मंच पर लक्ष्मी-कुबेर के चित्रों की जगह महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस के चित्र लगाए गए।
2002 से हुई महिला पात्रों की एंट्री
वर्ष 2002 से अहिल्या के पात्र के रूप में इति नेगी पहली महिला कलाकार ने रामलीला में एंट्री की। जबकि 2005 से सभी महिला पात्रों के लिए महिला किरदारों को रामलीला में शामिल किया गया।
ब्रिटिश गढ़वाल में पौड़ी की रामलीला की बढ़ती लोकप्रियता के चलते इसे पारसी थिएटर में तब्दील किया गया। 1993 में पारसी रंगमंच की तर्ज पर पौड़ी की रामलीला प्रचलित होकर एक प्रभावशाली नाट्य परंपरा बनती चली गई। अब पौड़ी रामलीला के रंगमंच में प्रोसेनियम मंच, चित्रमय पर्दे और मंच प्रभाव को शामिल किया गया। जो कि दर्शकों को बांधे रखने के लिए कर्णप्रिय संगीत, नृत्य और हास्य प्रस्तुतियाें का मिश्रण प्रस्तुत करते थे।
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गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी भी रामलीला मंच में जुड़े रहे
लंबे समय से रामलीला मंचन का संचालन कर रहे शिक्षाविद विरेंद्र खंकरियाल बताते हैं कि गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी भी रामलीला के कई यादगार किरदार निभाया करते थे। पौड़ीगांव में जन्मे नेगी बाल्यकाल से लेकर युवावस्था तक कई बार भरत, शत्रुघ्न व अहिल्या के साथ ही वानर सेना में शामिल होते। वहीं शुरुआती दौर में कई मुस्लिम युवकों ने भी रामलीला में प्रमुख किरदार निभाए। जिसमें मो. सद्दीक कुंभकर्ण व मो. यासीन लक्ष्मण बने जबकि ईसाई समुदाय के विक्टर भी सुषैण वैद्य के किरदार निभाया करते थे।
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गणेश वंदना की जगह गूंजे स्वतंत्रता की गीत
1947 में देश की आजादी के समय पौड़ी रामलीला भी पूरी तरह से आजादी के रंग में रंग गई। रामलीला के पारंपरिक वंदना की जगह मथुरा प्रसाद डोभाल रचित स्वतंत्र भारत पुण्य भूमि में रामराज आया गीत को वंदना स्वरूप प्रस्तुत किया गया। वहीं स्वतंत्रता के बाद हुई रामलीला के मंच पर लक्ष्मी-कुबेर के चित्रों की जगह महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस के चित्र लगाए गए।
2002 से हुई महिला पात्रों की एंट्री
वर्ष 2002 से अहिल्या के पात्र के रूप में इति नेगी पहली महिला कलाकार ने रामलीला में एंट्री की। जबकि 2005 से सभी महिला पात्रों के लिए महिला किरदारों को रामलीला में शामिल किया गया।