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Kotdwar News: छावनियों के नगर निकाय में विलय को लेकर स्पष्ट नहीं तस्वीर
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लैंसडौन। देश की 62 छावनियों के नगर निकाय में विलय को लेकर अभी तक तस्वीर स्पष्ट नहीं है, लेकिन लैंसडौन के लोगों को उम्मीद है कि दिसंबर 2025 तक लैंसडौन को नगर निकाय का दर्जा मिल जाएगा।बताया जा रहा है कि 62 में से हिमाचल की योल छावनी सहित छह छावनियों के सिविल क्षेत्र को नगर निकाय का दर्जा देने की रक्षा मंत्रालय की कवायद पूरी कर ली गई है। अप्रैल में एक और छावनी बोर्ड झारखंड की रामगढ़ छावनी के नगर निकाय में शामिल होने की चर्चा चल रही है। सूत्रों का कहना है कि केंद्र सरकार व झारखंड सरकार के बीच सहमति बन गई है।
वित्तीय मामले, भूमि, भवन, संपत्ति, परिसंपत्ति, कर्मचारियों के हस्तांतरण का भी रक्षा मंत्रालय निर्णय ले चुकी है। वहीं, उत्तराखंड की दो छावनियों देहरादून व क्लेमेंटाउन और यूपी की आठ छावनियों के सिविल क्षेत्र को नगर निकाय में शामिल करने को लेकर रक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों व इन दोनों राज्यों के सिविल प्रशासनिक अधिकारियों की 9 जनवरी 2025 को दिल्ली में बैठक हो चुकी है। जिसमें भूमि, भवन हस्तांतरण को लेकर चर्चाएं हुईं।
कैंट सिटीजन वेलफेयर एसोसिएशन के वरिष्ठ सदस्य हितेश शर्मा ने बताया कि 2014 के बाद से ही देश की 62 छावनी बोर्ड को हटाकर इनके नगर निकाय में विलय करने की तैयारी शुरू हो गई थी। इसकी बड़ी वजह सालाना 500 करोड़ रुपये के सेना के खर्च को बचाकर इसे सेना के मद में विलय करना था। वहीं, रक्षा मंत्रालय वर्ष 2017 में लागू नई लीज नीति को एक वर्ष तक के लिए बढ़ाने का फैसला ले चुका है। अनुमान है कि रक्षा मंत्रालय लीज भूमि व संपत्तियों के मामलों काे अपने स्तर से निस्तारित कर इन्हें राज्य सरकार के अधीन कर सकता है।
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वित्तीय मामले, भूमि, भवन, संपत्ति, परिसंपत्ति, कर्मचारियों के हस्तांतरण का भी रक्षा मंत्रालय निर्णय ले चुकी है। वहीं, उत्तराखंड की दो छावनियों देहरादून व क्लेमेंटाउन और यूपी की आठ छावनियों के सिविल क्षेत्र को नगर निकाय में शामिल करने को लेकर रक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों व इन दोनों राज्यों के सिविल प्रशासनिक अधिकारियों की 9 जनवरी 2025 को दिल्ली में बैठक हो चुकी है। जिसमें भूमि, भवन हस्तांतरण को लेकर चर्चाएं हुईं।
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कैंट सिटीजन वेलफेयर एसोसिएशन के वरिष्ठ सदस्य हितेश शर्मा ने बताया कि 2014 के बाद से ही देश की 62 छावनी बोर्ड को हटाकर इनके नगर निकाय में विलय करने की तैयारी शुरू हो गई थी। इसकी बड़ी वजह सालाना 500 करोड़ रुपये के सेना के खर्च को बचाकर इसे सेना के मद में विलय करना था। वहीं, रक्षा मंत्रालय वर्ष 2017 में लागू नई लीज नीति को एक वर्ष तक के लिए बढ़ाने का फैसला ले चुका है। अनुमान है कि रक्षा मंत्रालय लीज भूमि व संपत्तियों के मामलों काे अपने स्तर से निस्तारित कर इन्हें राज्य सरकार के अधीन कर सकता है।
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