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गुरु गोरखनाथ के आर्शीवाद से मिली थी सिद्धबाबा को सिद्धि
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वार्षिक अनुष्ठान महोत्सव के लिए लाइटों से सजा कोटद्वार में स्थित सिद्धबली मंदिर।
- फोटो : KOTDWAR
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मान्यताओं के अनुसार सिद्धबली कत्यूर वंश के राजा के पुत्र थे, जिन्हें गुरु गोरखनाथ के आशीर्वाद से सिद्धि प्राप्त हुई थी। श्री सिद्धबली मंदिर ने अपनी पुस्तक में भी इसका उल्लेख किया है। जिसमें सिद्धबाबा का नाम पहले हरपाल बताया गया है। इस युवक के बलवान होने के कारण गुरु गोरखनाथ ने उसे सिद्धियां दिलाई, जिसके बाद उन्हें सिद्धबली अर्थात सिद्धबाबा के नाम से जाना गया। मान्यता है कि सिद्धबाबा ने पुराने कोटद्वार स्थित सिद्धों के डांडा (वर्तमान सिद्धबली मंदिर वाली पहाड़ी) नामक पहाड़ पर कई सालों तक तप किया था। मान्यता के अनुसार जिस वक्त हरपाल सिद्धि प्राप्त कर घर से निकला, उस वक्त उसने अपनी मां से आखिरी बार कुछ पकाकर खाने की इच्छा जाहिर की। जंगल जाते वक्त वह सवा सेर आटा और कुछ गुड़ अपने साथ ले गई थी। उसने उसी समय आग में पकाकर उसका रोट बना दिया। तब ही से सिद्धबली में सवा सेर रोट का प्रसाद चढ़ता है। मंदिर में हर दिन सवा मुठ्ठी या सवा किलो रोट चढ़ता है। मेले में सवा मन का रोट चढ़ता है। रोट चढ़ाने से भगवान सिद्धबली प्रसन्न होते हैं।
श्री सिद्धबली मंदिर समिति के अध्यक्ष कुंज बिहारी देवरानी के मुताबिक श्री सिद्धबली धाम गुरु गोरखनाथ जी की तपस्थ स्थली रही है। आदिकाल में मंदिर स्थल पर सिद्ध पीढ़ियां थी। 80 के दशक में मंदिर में बाबा की मूर्ति स्थापित हुई। इसके बाद ही मंदिर का सौंदर्यीकरण हुआ। यह भी मान्यता है कि हनुमान जी संजीवनी बूटी लेने के लिए इसी रास्ते हिमालय गए थे।
जागर में कही जाती है कथा
सिद्धबली मंदिर में जब जागर लगाए जाते हैं तो उसमें इस कथा का विस्तार से वर्णन किया जाता है। इसे सिद्धबाबा के जागर भी कहते हैं। मंदिर में नाथ समुदाय का विशेष महत्व होता है। सिद्धबली के गुरु गोरखनाथ का शिष्य होने के कारण नाथ समुदाय के लोग इस महोत्सव में बड़ी संख्या में शिरकत करते हैं। लैंसडौन विधायक दिलीप रावत श्री सिद्धबली मंदिर के महंत भी हैं। वह बताते हैं कि स्कंद पुराण के अध्याय 119 में इसका वर्णन मिलता है।
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2026 तक भंडारों की हो चुकी एडवांस बुकिंग
श्री सिद्धबली धाम कोटद्वार में बाबा की चौखट से कोई भी श्रद्धाुल निराश नहीं लौटता है। सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद यहां पूरी होती है। मनोकामना पूरी होते ही भक्त मंदिर में भंडारा कर हनुमान जी को भोग लगाते हैं। श्रद्धालुओं पर बजरंग बली की नेमत इस कदर बरसती है कि भंडारा आयोजन के लिए भक्तों को सालों साल इंतजार करना पड़ता है। धाम में अगले सात सालों यानि 2026 तक भंडारों की एडवांस बुकिंग चल रही है। भंडारा सुबह नौ बजे से अपराह्न तीन बजे तक चलता है।
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श्री सिद्धबली मंदिर समिति के अध्यक्ष कुंज बिहारी देवरानी के मुताबिक श्री सिद्धबली धाम गुरु गोरखनाथ जी की तपस्थ स्थली रही है। आदिकाल में मंदिर स्थल पर सिद्ध पीढ़ियां थी। 80 के दशक में मंदिर में बाबा की मूर्ति स्थापित हुई। इसके बाद ही मंदिर का सौंदर्यीकरण हुआ। यह भी मान्यता है कि हनुमान जी संजीवनी बूटी लेने के लिए इसी रास्ते हिमालय गए थे।
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जागर में कही जाती है कथा
सिद्धबली मंदिर में जब जागर लगाए जाते हैं तो उसमें इस कथा का विस्तार से वर्णन किया जाता है। इसे सिद्धबाबा के जागर भी कहते हैं। मंदिर में नाथ समुदाय का विशेष महत्व होता है। सिद्धबली के गुरु गोरखनाथ का शिष्य होने के कारण नाथ समुदाय के लोग इस महोत्सव में बड़ी संख्या में शिरकत करते हैं। लैंसडौन विधायक दिलीप रावत श्री सिद्धबली मंदिर के महंत भी हैं। वह बताते हैं कि स्कंद पुराण के अध्याय 119 में इसका वर्णन मिलता है।
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2026 तक भंडारों की हो चुकी एडवांस बुकिंग
श्री सिद्धबली धाम कोटद्वार में बाबा की चौखट से कोई भी श्रद्धाुल निराश नहीं लौटता है। सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद यहां पूरी होती है। मनोकामना पूरी होते ही भक्त मंदिर में भंडारा कर हनुमान जी को भोग लगाते हैं। श्रद्धालुओं पर बजरंग बली की नेमत इस कदर बरसती है कि भंडारा आयोजन के लिए भक्तों को सालों साल इंतजार करना पड़ता है। धाम में अगले सात सालों यानि 2026 तक भंडारों की एडवांस बुकिंग चल रही है। भंडारा सुबह नौ बजे से अपराह्न तीन बजे तक चलता है।