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लॉकडाउन ने छीनी मजदूरी, पैदल ही बरेली अपने घर के लिए निकले 17 मजदूर
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कोटद्वार। कोरोना वायरस के बढ़ते खतरे को देखते हुए 21 दिन के लॉकडाउन से मजदूरों के समक्ष रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है। ठेकेदार मजदूरों को उनकी मजदूरी का भुगतान भी नहीं कर रहे हैं, जिससे सतपुली में काम कर रहे 17 मजदूर पैदल ही अपने घर बरेली जाने के लिए निकल पड़े हैं।
यूपी के जिला बरेली के बहेड़ी गांव निवासी ईश्वरी प्रसाद ने बताया कि वे गत तीन माह से सतपुली में सतपुली-खरकोली मार्ग निर्माण का कार्य कर रहे थे। होली के दौरान ठेकेदार ने उन्हें 65 हजार रुपये मजदूरी का भुगतान किया था, लेकिन होली से लेकर अब तक ठेकेदार ने उनका 80 हजार रुपये मजदूरी का भुगतान नहीं किया है। लॉकडाउन के चलते पिछले सात दिन से काम बंद है। मुंशी से मजदूरी देने के लिए कहा तो उसने हाथ खड़े कर दिए, जबकि ठेकेदार भी देहरादून में है। मजदूरी नहीं मिलने से उनके पास घर जाने के लिए बस का किराया और खाने के लिए पैसे तक नहीं हैं, इसलिए उन्होंने घर जाने का फैसला लिया। वे शनिवार को सतपुली से चले थे। रास्ते में गुमखाल में एक संस्था ने उन्हें खाने के लिए राशन दिया। जंगल में खाना बनाकर खाया और किसी तरह वे रविवार दोपहर को कोटद्वार पहुंचे हैं। उनका एक ही लक्ष्य है कि वे किसी तरह घर पहुंच जाएं। उन्हें घर भेजने के लिए प्रशासन की ओर से भी कोई कदम नहीं उठाए गए हैं।
फोटो--
चमोली जिले से मजदूरों का पलायन शुरू
रविवार को सैकड़ों मजदूर ऋषिकेश और रानीखेत हाईवे पर दिनभर पैदल चलते रहे
संवाद न्यूज एजेंसी
कर्णप्रयाग। लॉकडाउन के दौरान काम नहीं मिलने के कारण चमोली जिले से अन्य राज्यों के निवासियों का पलायन शुरू हो गया है। पिछले दो दिनों से लगातार मजदूर सड़कों पर जत्थे के रूप में पैदल अपने राज्यों को जा रहे हैं।
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चमोली जिले के जोशीमठ, कर्णप्रयाग, चमोली सहित अन्य कस्बों में बिहार, यूपी व अन्य राज्यों के लोग काफी संख्या में मजदूरी करते हैं। कारोना वायरस की मार भी सबसे ज्यादा इन्हीं मजदूरों पर पड़ी है। शनिवार देर शाम से लेकर रविवार को सैकड़ों मजदूर ऋषिकेश और रानीखेत हाईवे पर दिनभर पैदल चलते रहे। मजदूरों का कहना है कि जिन संस्थानों में वे काम करते थे, वे लॉकडाउन के कारण बंद हो चुके हैं। साथ ही दुकानें भी बंद हैं। ऐसे में उनको पल्लेदारी का काम भी नहीं मिल रहा है। उन्होंने कहा कि काम न मिलने से उनके सामने खाने पीने की समस्या खड़ी हो गई है, जिससे वे अपने घरों को लौट रहे हैं।
गौचर। काम बंद होने से अपने घरों को पैदल लौट रहे विभिन्न कंपनियों के मजदूरों को प्रशासन, पुलिस और जनप्रतिनिधियों ने खाने की व्यवस्था कर गाड़ियों से उन्हें घरों तक पहुंचाने में मदद की। बिरही, हेलंग व जोशीमठ आदि स्थानों से कंपनियों में काम करने वाले करीब 103 मजदूर शनिवार देर रात सामान सहित पैदल गौचर पहुंचे। सूचना पर डीएम स्वाति एस भदौरिया ने प्रशासनिक अधिकारियों को मजदूरों के स्वास्थ्य परीक्षण और उन्हें घर पहुंचाने के लिए वाहनों का इंतजाम करने के निर्देश दिए। साथ ही पूर्व पालिका अध्यक्ष मुकेश नेगी, उद्योग व्यापार मंडल के प्रदेश मीडिया प्रभारी सुनील पंवार, व्यापार संघ अध्यक्ष राकेश लिंगवाल व सभासद अनिल नेगी आदि ने मजदूरों को खाना खिलाया। पालिकाध्यक्ष अंजू बिष्ट तथा पालिका के कर्मचारियों ने भी हरिद्वार से परवाड़ी गैरसैंण के लिए पैदल लौट रहे छह युवकों को पालिका के वाहन से गांव तक पहुंचाया।
नेपाल वापस लौटने के लिए मजदूरों के पास पैसे नहीं
उधार के भरोसे चल रहे नेपाली मजदूरों की जिंदगी
अमर उजाला ब्यूरो
नई टिहरी। कालीमाठी नेपाल का बल बहादुर और नवीन बहादुर घर जाना चाहता है, लेकिन घर जाने के लिए जेब में पैसे नहीं हैं। दो वक्त का खाना मददगार मुहैया करा रहे हैं तो पेट भर जा रहा है। एक सप्ताह सेे डेरे पर खाली बैठे हैं। हम घर पैदल भी चले जाएंगे साहब, लेकिन छोटे बच्चों को कैसे ले जाएं। इन चुनौतियों से नई टिहरी बौराड़ी बस अड्डे के समीप निवासरत 50 से अधिक नेपालियों का परिवार जूझ रहा है।
कोरोना के डर से नेपाली मजदूर भी संकट से जूझ रहे हैं। हर दिन गुलजार रहने वाले नई टिहरी के बौराड़ी बस अड्डे में इन दिनों वीरानी छाई हुई है। काम धंधा बंद है। अब दो जून की रोटी के लिए नेपाली मजदूर जद्दोजहद कर रहे हैं। बस अड्डे के आसपास लगभग 50 से अधिक नेपाली मजदूरों का परिवार निवासरत हैं। सभी दिहाड़ी-मजदूरी से अपना पेट भरते हैं, लेकिन लॉकडाउन के चलते पिछले एक सप्ताह से उनका रोजगार ठप है। कालीमाठी नेपाल निवासी नवीन बहादुर पत्नी और छह माह की बेटी के साथ यहां रहते हैं। दो-तीन दिन से लोग उन्हें दिन और सांय के वक्त बस अड्डे पर आकर खाना दे रहे हैं, लेकिन जेब में पैसे न होने के कारण नन्ही बेटी को वे दूध नहीं पिला पा रहे हैं।
नेपाल जाजलकोट की गौरापति अपने तीन छोटे बच्चों के साथ पांच साल से बौराड़ी में रहती है। कोरोना संक्रमण की सूचना पर परिवार के सदस्यों ने उन्हें घर बुलाया है, लेकिन जेब में इतना पैसा नहीं कि वह बच्चों को लेकर नेपाल जा सके। बल बहादुर कहते हैं कि वह भी अपने देश वापस जाना चाहते हैं, लेकिन जाने के लिए उनके पास कोई संसाधन नहीं है। कुछ लोगों ने डेरे में आकर एक-एक किलो आटा और तीन किलो चावल भी दिए हैं, लेकिन वह पर्याप्त नहीं है। अन्य नेपाली परिवारों की स्थिति भी इनसे अलग नहीं है। लोगों के भरोसे कब तक खाना मिलेगा साहब।
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गैर प्रदेशों के मजदूरों को किया जा रहा है सूचीबद्ध
घर भेजे जाने की अफवाह से हुई मजदूरों की भीड़
अमर उजाला ब्यूरो
श्रीनगर। प्रशासन ने क्षेत्र में रह रहे अन्य प्रदेशों के मजदूरों की सूची बनानी शुरू कर दी है ताकि उक्त मजदूरों को राशन उपलब्ध कराई जा सके। वहीं, मजदूरों के बीच यह अफवाह फैल गई कि सरकार उनको उनके घर भेज रही है। इसके चलते भारी संख्या में मजदूर अपना नाम दर्ज कराने पहुंच गए। हालांकि मजदूरों ने यह भी शर्त रखी कि जब सरकार उन्हें गांव तक पहुंचाएगी, तभी वे वापस जाएंगे।
श्रीनगर, डांग, उफल्डा व श्रीकोट सहित नदियों में काम करने वालों मजदूरों की संख्या पांच हजार से ऊपर है। पिछले दिनों से काम बंद होने की वजह से उनके समक्ष जीवनयापन का संकट खड़ा हो गया है। हालांकि भाजपा की ओर से श्रीनगर मेें रह रहे मजदूरों को एक वक्त निशुल्क भोजन खिलाया जा रहा है, लेकिन यह व्यवस्था पर्याप्त नहीं है।
दिक्कत यह है कि प्रशासन के पास इनकी संख्या उपलब्ध नहीं है। जिला अधिकारी धीराज गर्ब्याल ने बताया कि मजदूरों को सूचीबद्ध किया जा रहा है, जिससे यह उनकी वास्तविक संख्या की जानकारी मिल सके और सरकारी मदद पहुंचाई जा सके।
वहीं, शहर के एक वेडिंग प्वाइंट में मजदूरों की लिस्ट बनाए जाने की सूचना मिलने पर मजदूर लॉकडाउन छूट अवधि खत्म होने के बाद सड़क पर निकल आए। देखते ही देखते पंजीकरण स्थान पर भारी संख्या में मजदूर एकत्रित हो गए, जिससे सोशल डिस्टेंसिंग का नियम धरा का धरा रह गया।
बाहरी राज्यों में फंसे लोग लगा रहे घर वापसी की गुहार
उत्तरकाशी। शिक्षा एवं रोजगार के सिलसिले में बाहरी राज्यों में गए उत्तरकाशी के सैकड़ों युवा लॉकडाउन के चलते वहीं फंस गए हैं। काम कारोबार ठप होने के कारण इन लोगों के समक्ष वहां रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है। ऐसे में ये लोग घर वापसी की गुहार लगा रहे हैं।
अहमदाबाद गुजरात में फंसे गाजणा क्षेत्र के अब्बल सिंह नेगी ने दूरभाष पर बताया कि वहां उत्तरकाशी के ही सौ से अधिक युवक फंसे हुए हैं। जिन होटलों में ये युवक काम करते थे, वे अब बंद हो गए हैं। इस कारण इन लोगों को दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल होता जा रहा है। उन्होंने बताया कि बीते रोज उत्तराखंड में फंसे गुजरात के लोगों को लेकर यहां आए वाहनों के चालकों से संपर्क करने पर उन्होंने भी इन लोगों को वापस उत्तराखंड लाने से इनकार कर दिया। उन्होंने उत्तराखंड सरकार से घर वापसी की व्यवस्था करने की गुहार लगाई है। जिले के हर गांव से 10-20 लोग बाहरी क्षेत्रों में रहकर आजीविका कमाते हैं। इनमें से बड़ी संख्या में लोग लॉकडाउन के चलते वहीं फंस गए हैं। शनिवार को जिला प्रशासन ने इस तरह के 137 लोगों की सूची शासन को प्रेषित की थी। रविवार को जिले के विभिन्न गांवों से लोग इस तरह की सूची तैयार कर अब प्रशासन को भेज रहे हैं। अभी तक इन लोगों की घर वापसी के कोई इंतजाम नहीं हो पाए हैं। डीएम डॉ. आशीष चौहान ने बताया कि बाहरी राज्यों में फंसे उत्तरकाशी के लोगों की सूचना शासन को दी जा रही है ताकि उन लोगों के लिए वहीं रहने और भोजन आदि की समुचित व्यवस्था कराई जा सके।
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यूपी के जिला बरेली के बहेड़ी गांव निवासी ईश्वरी प्रसाद ने बताया कि वे गत तीन माह से सतपुली में सतपुली-खरकोली मार्ग निर्माण का कार्य कर रहे थे। होली के दौरान ठेकेदार ने उन्हें 65 हजार रुपये मजदूरी का भुगतान किया था, लेकिन होली से लेकर अब तक ठेकेदार ने उनका 80 हजार रुपये मजदूरी का भुगतान नहीं किया है। लॉकडाउन के चलते पिछले सात दिन से काम बंद है। मुंशी से मजदूरी देने के लिए कहा तो उसने हाथ खड़े कर दिए, जबकि ठेकेदार भी देहरादून में है। मजदूरी नहीं मिलने से उनके पास घर जाने के लिए बस का किराया और खाने के लिए पैसे तक नहीं हैं, इसलिए उन्होंने घर जाने का फैसला लिया। वे शनिवार को सतपुली से चले थे। रास्ते में गुमखाल में एक संस्था ने उन्हें खाने के लिए राशन दिया। जंगल में खाना बनाकर खाया और किसी तरह वे रविवार दोपहर को कोटद्वार पहुंचे हैं। उनका एक ही लक्ष्य है कि वे किसी तरह घर पहुंच जाएं। उन्हें घर भेजने के लिए प्रशासन की ओर से भी कोई कदम नहीं उठाए गए हैं।
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चमोली जिले से मजदूरों का पलायन शुरू
रविवार को सैकड़ों मजदूर ऋषिकेश और रानीखेत हाईवे पर दिनभर पैदल चलते रहे
संवाद न्यूज एजेंसी
कर्णप्रयाग। लॉकडाउन के दौरान काम नहीं मिलने के कारण चमोली जिले से अन्य राज्यों के निवासियों का पलायन शुरू हो गया है। पिछले दो दिनों से लगातार मजदूर सड़कों पर जत्थे के रूप में पैदल अपने राज्यों को जा रहे हैं।
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चमोली जिले के जोशीमठ, कर्णप्रयाग, चमोली सहित अन्य कस्बों में बिहार, यूपी व अन्य राज्यों के लोग काफी संख्या में मजदूरी करते हैं। कारोना वायरस की मार भी सबसे ज्यादा इन्हीं मजदूरों पर पड़ी है। शनिवार देर शाम से लेकर रविवार को सैकड़ों मजदूर ऋषिकेश और रानीखेत हाईवे पर दिनभर पैदल चलते रहे। मजदूरों का कहना है कि जिन संस्थानों में वे काम करते थे, वे लॉकडाउन के कारण बंद हो चुके हैं। साथ ही दुकानें भी बंद हैं। ऐसे में उनको पल्लेदारी का काम भी नहीं मिल रहा है। उन्होंने कहा कि काम न मिलने से उनके सामने खाने पीने की समस्या खड़ी हो गई है, जिससे वे अपने घरों को लौट रहे हैं।
गौचर। काम बंद होने से अपने घरों को पैदल लौट रहे विभिन्न कंपनियों के मजदूरों को प्रशासन, पुलिस और जनप्रतिनिधियों ने खाने की व्यवस्था कर गाड़ियों से उन्हें घरों तक पहुंचाने में मदद की। बिरही, हेलंग व जोशीमठ आदि स्थानों से कंपनियों में काम करने वाले करीब 103 मजदूर शनिवार देर रात सामान सहित पैदल गौचर पहुंचे। सूचना पर डीएम स्वाति एस भदौरिया ने प्रशासनिक अधिकारियों को मजदूरों के स्वास्थ्य परीक्षण और उन्हें घर पहुंचाने के लिए वाहनों का इंतजाम करने के निर्देश दिए। साथ ही पूर्व पालिका अध्यक्ष मुकेश नेगी, उद्योग व्यापार मंडल के प्रदेश मीडिया प्रभारी सुनील पंवार, व्यापार संघ अध्यक्ष राकेश लिंगवाल व सभासद अनिल नेगी आदि ने मजदूरों को खाना खिलाया। पालिकाध्यक्ष अंजू बिष्ट तथा पालिका के कर्मचारियों ने भी हरिद्वार से परवाड़ी गैरसैंण के लिए पैदल लौट रहे छह युवकों को पालिका के वाहन से गांव तक पहुंचाया।
नेपाल वापस लौटने के लिए मजदूरों के पास पैसे नहीं
उधार के भरोसे चल रहे नेपाली मजदूरों की जिंदगी
अमर उजाला ब्यूरो
नई टिहरी। कालीमाठी नेपाल का बल बहादुर और नवीन बहादुर घर जाना चाहता है, लेकिन घर जाने के लिए जेब में पैसे नहीं हैं। दो वक्त का खाना मददगार मुहैया करा रहे हैं तो पेट भर जा रहा है। एक सप्ताह सेे डेरे पर खाली बैठे हैं। हम घर पैदल भी चले जाएंगे साहब, लेकिन छोटे बच्चों को कैसे ले जाएं। इन चुनौतियों से नई टिहरी बौराड़ी बस अड्डे के समीप निवासरत 50 से अधिक नेपालियों का परिवार जूझ रहा है।
कोरोना के डर से नेपाली मजदूर भी संकट से जूझ रहे हैं। हर दिन गुलजार रहने वाले नई टिहरी के बौराड़ी बस अड्डे में इन दिनों वीरानी छाई हुई है। काम धंधा बंद है। अब दो जून की रोटी के लिए नेपाली मजदूर जद्दोजहद कर रहे हैं। बस अड्डे के आसपास लगभग 50 से अधिक नेपाली मजदूरों का परिवार निवासरत हैं। सभी दिहाड़ी-मजदूरी से अपना पेट भरते हैं, लेकिन लॉकडाउन के चलते पिछले एक सप्ताह से उनका रोजगार ठप है। कालीमाठी नेपाल निवासी नवीन बहादुर पत्नी और छह माह की बेटी के साथ यहां रहते हैं। दो-तीन दिन से लोग उन्हें दिन और सांय के वक्त बस अड्डे पर आकर खाना दे रहे हैं, लेकिन जेब में पैसे न होने के कारण नन्ही बेटी को वे दूध नहीं पिला पा रहे हैं।
नेपाल जाजलकोट की गौरापति अपने तीन छोटे बच्चों के साथ पांच साल से बौराड़ी में रहती है। कोरोना संक्रमण की सूचना पर परिवार के सदस्यों ने उन्हें घर बुलाया है, लेकिन जेब में इतना पैसा नहीं कि वह बच्चों को लेकर नेपाल जा सके। बल बहादुर कहते हैं कि वह भी अपने देश वापस जाना चाहते हैं, लेकिन जाने के लिए उनके पास कोई संसाधन नहीं है। कुछ लोगों ने डेरे में आकर एक-एक किलो आटा और तीन किलो चावल भी दिए हैं, लेकिन वह पर्याप्त नहीं है। अन्य नेपाली परिवारों की स्थिति भी इनसे अलग नहीं है। लोगों के भरोसे कब तक खाना मिलेगा साहब।
फोटो
गैर प्रदेशों के मजदूरों को किया जा रहा है सूचीबद्ध
घर भेजे जाने की अफवाह से हुई मजदूरों की भीड़
अमर उजाला ब्यूरो
श्रीनगर। प्रशासन ने क्षेत्र में रह रहे अन्य प्रदेशों के मजदूरों की सूची बनानी शुरू कर दी है ताकि उक्त मजदूरों को राशन उपलब्ध कराई जा सके। वहीं, मजदूरों के बीच यह अफवाह फैल गई कि सरकार उनको उनके घर भेज रही है। इसके चलते भारी संख्या में मजदूर अपना नाम दर्ज कराने पहुंच गए। हालांकि मजदूरों ने यह भी शर्त रखी कि जब सरकार उन्हें गांव तक पहुंचाएगी, तभी वे वापस जाएंगे।
श्रीनगर, डांग, उफल्डा व श्रीकोट सहित नदियों में काम करने वालों मजदूरों की संख्या पांच हजार से ऊपर है। पिछले दिनों से काम बंद होने की वजह से उनके समक्ष जीवनयापन का संकट खड़ा हो गया है। हालांकि भाजपा की ओर से श्रीनगर मेें रह रहे मजदूरों को एक वक्त निशुल्क भोजन खिलाया जा रहा है, लेकिन यह व्यवस्था पर्याप्त नहीं है।
दिक्कत यह है कि प्रशासन के पास इनकी संख्या उपलब्ध नहीं है। जिला अधिकारी धीराज गर्ब्याल ने बताया कि मजदूरों को सूचीबद्ध किया जा रहा है, जिससे यह उनकी वास्तविक संख्या की जानकारी मिल सके और सरकारी मदद पहुंचाई जा सके।
वहीं, शहर के एक वेडिंग प्वाइंट में मजदूरों की लिस्ट बनाए जाने की सूचना मिलने पर मजदूर लॉकडाउन छूट अवधि खत्म होने के बाद सड़क पर निकल आए। देखते ही देखते पंजीकरण स्थान पर भारी संख्या में मजदूर एकत्रित हो गए, जिससे सोशल डिस्टेंसिंग का नियम धरा का धरा रह गया।
बाहरी राज्यों में फंसे लोग लगा रहे घर वापसी की गुहार
उत्तरकाशी। शिक्षा एवं रोजगार के सिलसिले में बाहरी राज्यों में गए उत्तरकाशी के सैकड़ों युवा लॉकडाउन के चलते वहीं फंस गए हैं। काम कारोबार ठप होने के कारण इन लोगों के समक्ष वहां रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है। ऐसे में ये लोग घर वापसी की गुहार लगा रहे हैं।
अहमदाबाद गुजरात में फंसे गाजणा क्षेत्र के अब्बल सिंह नेगी ने दूरभाष पर बताया कि वहां उत्तरकाशी के ही सौ से अधिक युवक फंसे हुए हैं। जिन होटलों में ये युवक काम करते थे, वे अब बंद हो गए हैं। इस कारण इन लोगों को दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल होता जा रहा है। उन्होंने बताया कि बीते रोज उत्तराखंड में फंसे गुजरात के लोगों को लेकर यहां आए वाहनों के चालकों से संपर्क करने पर उन्होंने भी इन लोगों को वापस उत्तराखंड लाने से इनकार कर दिया। उन्होंने उत्तराखंड सरकार से घर वापसी की व्यवस्था करने की गुहार लगाई है। जिले के हर गांव से 10-20 लोग बाहरी क्षेत्रों में रहकर आजीविका कमाते हैं। इनमें से बड़ी संख्या में लोग लॉकडाउन के चलते वहीं फंस गए हैं। शनिवार को जिला प्रशासन ने इस तरह के 137 लोगों की सूची शासन को प्रेषित की थी। रविवार को जिले के विभिन्न गांवों से लोग इस तरह की सूची तैयार कर अब प्रशासन को भेज रहे हैं। अभी तक इन लोगों की घर वापसी के कोई इंतजाम नहीं हो पाए हैं। डीएम डॉ. आशीष चौहान ने बताया कि बाहरी राज्यों में फंसे उत्तरकाशी के लोगों की सूचना शासन को दी जा रही है ताकि उन लोगों के लिए वहीं रहने और भोजन आदि की समुचित व्यवस्था कराई जा सके।