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शहादत दिवस पर बाबा उत्तराखंडी को किया याद
अमर उजाला, कोटद्वार
Updated Tue, 09 Aug 2016 11:21 PM IST
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बाबा मोहन उत्तराखंडी के तेरहवें शहादत दिवस पर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। इस मौके पर आयोजित एक विचार गोष्ठी में बाबा के सहयोगियों ने उनकी शहादत को बेकार न जाने देने का संकल्प लिया।
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यहां कार्यक्रम में वक्ताओं ने सतपुली को बाबा की कर्मस्थली बताते हुए उनके पैतृक गांव बंठोली के शहीद ग्राम घोषित होने के बावजूद गांव की दुर्दशा पर आक्रोश जताया। बाबा द्वारा उठाए गए मुद्दों पर राजनैतिक दलों के दोहरे रवैए पर भी नाराजगी जताते हुए वक्ताओं ने बाबा के नाम से एक मंच बनाने का सुझाव भी दिया।
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चकबंदी के प्रणेता गणेश गरीब की अध्यक्षता में हुई गोष्ठी का संचालन तीरथ सिंह राही ने किया। इस अवसर पर बाबा के पैतृक गांव बंठोली के प्रधान हरीश जुयाल, बलवीर सिंह नेगी, थामेश्वर कुकरेती, बिष्णु सिंह, होशियार सिंह, जगदीश बिष्ट, हरीश स्वामी, नरेंद्र नेगी, विनोद धस्माना ने बाबा के संघर्ष पर विस्तार से चर्चा की।
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वक्ताओं ने कहा कि देहरादून में केेंद्रित होते पहाड़ी राज्य उत्तराखंड को पहाड़ की ओर लाने के प्रयास, स्थानीय निवासियों के हितों को सुरक्षित और सर्वोपरी रखने के लिए भूखे प्यासे रहकर आंदोलन करते हुए जान देने वाले बाबा मोहन उत्तराखंडी को सरकार और यहां के नेताओं ने भुला दिया है। चाहे गैरसैंण में स्थायी राजधानी का मुद्दा हो या फिर अन्य जनपक्षीय विषय वह न सिर्फ आज भी वैसे ही खड़े हैं, बल्कि और भी विकट स्थिति में आ चुके हैं।
बंठोली गांव के थे बाबा उत्तराखंडी
पौड़ी जिले के एकेश्वर ब्लाक के नयारघाटी के पास बंठोली गांव निवासी मनवर सिंह नेगी के घर जन्में मोहन सिंह ने प्रावि मौदाड़ी से पांचवीं और जीआईसी सतपुली से दसवीं करने के बाद दुगड्डा से आईटीआई की थी। उसके बाद सेना की बीईजी कोर में भर्ती हुए, लेकिन समाज और पहाड़ के लिए कुछ करने की ललक के चलते उन्होंने सेना की नौकरी छोड़कर क्षेत्रीय समस्याओं के लिए संघर्ष करना शुरू किया। 1988 से 1996 तक वे ग्राम पंचायत बंठोली के प्रधान रहे। पहाड़ के लिए उनके द्वारा किए जाने वाले संघर्षों के चलते ही लोगों ने उन्हें बाबा उत्तराखंडी नाम पड़ा।