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फ्यूंलडिया त्वे देखि औदूं ये मन मा...
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कोटद्वार। जयहरीखाल ब्लॉक के ग्राम चाई में चल रहे चाई ग्रामोत्सव के दूसरे दिन मंगलवार को लोक गायक किशन महिपाल के गीतों का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोला। समारोह में भारतीय संस्कृति और लोकभाषा गढ़वाली पर कार्यशाला में रिवर्स माइग्रेशन और लोक संस्कृति को बचाने की जरूरत बताई गई।
विचार गोष्ठी का शुभारंभ मुख्य अतिथि साहित्यकार डा. नंदकिशोर ढौंडियाल ने किया। उन्होंने कहा कि चाई महोत्सव यह दर्शाता है कि यहां के लोग अपनी संस्कृति को बचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने रिवर्स माइग्रेशन के लिए इस तरह के आयोजनों को जरूरी बताया। कहा कि प्रवासी लोगों को अपने मूल गांव लौटने की आवश्यकता है। उन्होंने नई पीढ़ी को गढ़वाली भाषा और लोकाचार सीखने की जरूरत भी बताई। विशिष्ट अतिथि लिविंग ऑफ आर्ट के नेशनल टीम के सदस्य इंजीनियर मोहित सती ने कहा कि चाई ने समाज जागरण की जो अलख जगाई है, वह चारों ओर फैलनी चाहिए। मुख्य वक्ता उत्तरांचल उत्थान परिषद के अध्यक्ष प्रेम बुड़ाकोटी ने लोक संस्कृति के संरक्षण और संवर्द्धन को जरूरी बताया।
इस मौके पर डा. मनोरमा ढौंडियाल, हिमालय चिपको फाउंडेशन के जेपी डबराल, आशीष ममगाईं, सिकेंद्र, शिवेंद्र ढौंडियाल, सतीश बुड़ाकोटी, जगमोहन बुड़ाकोटी, ज्ञानानंद प्रसाद, सच्चिदानंद, संगीत बुड़ाकोटी, कमलेश बुड़ाकोटी, ललन बुड़ाकोटी, राजेश कुमार, महिमानंद, सुबोधनी, आरती, शोभा बुड़ाकोटी आदि ने विचार रखे। इस मौके पर लोक गायक किशन महिपाल ने रानीखेत रामडोला.., किंगरी का झाला घुघुती.., फ्यूंलड़िया त्वे देखिक आंदू यू मन मा.., स्याली बमपाली.. आदि गीतों की प्रस्तुतियां देकर लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया। साक्षी, स्मृति, सीमा और दिशा की प्रस्तुतियों को भी खूब सराहा गया।
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विचार गोष्ठी का शुभारंभ मुख्य अतिथि साहित्यकार डा. नंदकिशोर ढौंडियाल ने किया। उन्होंने कहा कि चाई महोत्सव यह दर्शाता है कि यहां के लोग अपनी संस्कृति को बचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने रिवर्स माइग्रेशन के लिए इस तरह के आयोजनों को जरूरी बताया। कहा कि प्रवासी लोगों को अपने मूल गांव लौटने की आवश्यकता है। उन्होंने नई पीढ़ी को गढ़वाली भाषा और लोकाचार सीखने की जरूरत भी बताई। विशिष्ट अतिथि लिविंग ऑफ आर्ट के नेशनल टीम के सदस्य इंजीनियर मोहित सती ने कहा कि चाई ने समाज जागरण की जो अलख जगाई है, वह चारों ओर फैलनी चाहिए। मुख्य वक्ता उत्तरांचल उत्थान परिषद के अध्यक्ष प्रेम बुड़ाकोटी ने लोक संस्कृति के संरक्षण और संवर्द्धन को जरूरी बताया।
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इस मौके पर डा. मनोरमा ढौंडियाल, हिमालय चिपको फाउंडेशन के जेपी डबराल, आशीष ममगाईं, सिकेंद्र, शिवेंद्र ढौंडियाल, सतीश बुड़ाकोटी, जगमोहन बुड़ाकोटी, ज्ञानानंद प्रसाद, सच्चिदानंद, संगीत बुड़ाकोटी, कमलेश बुड़ाकोटी, ललन बुड़ाकोटी, राजेश कुमार, महिमानंद, सुबोधनी, आरती, शोभा बुड़ाकोटी आदि ने विचार रखे। इस मौके पर लोक गायक किशन महिपाल ने रानीखेत रामडोला.., किंगरी का झाला घुघुती.., फ्यूंलड़िया त्वे देखिक आंदू यू मन मा.., स्याली बमपाली.. आदि गीतों की प्रस्तुतियां देकर लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया। साक्षी, स्मृति, सीमा और दिशा की प्रस्तुतियों को भी खूब सराहा गया।
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