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52 हेक्टयेर खेती की जमीन बंजर होने के कगार पर
Updated Thu, 16 Nov 2017 10:38 PM IST
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कोटद्वार। कोटद्वार में गत 3/4 अगस्त को बादल फटने के बाद आई आपदा को लेकर शासन, प्रशासन और राज्य सरकार कितनी संवेदनशील है, इसकी एक बानगी आपदा प्रभावित क्षेत्रों में देखने को मिल रही है। मुख्यमंत्री, कैबिनेट मंत्रियों, कमिश्नर से लेकर तमाम आला अधिकारियों के भ्रमण और आपदा राहत के नाम पर बड़ी-बड़ी घोषणाएं लोगों का मुंह चिढ़ा रही हैं। साढ़े तीन महीने बीत गए हैं, लेकिन सिंचाई विभाग तहसील मुख्यालय कोटद्वार के अपर कालाबड़ की गिवईं सिंचाई नहर में सिंचाई व्यवस्था बहाल नहीं कर सका है। आपदा के कारण गिवईं स्रोत गहरा हो गया है, जबकि नहर का मुहाना काफी ऊंचा हो गया है। पूरी नहर मलबे से पटी पड़ी है। सिंचाई व्यवस्था बहाल न होने से करीब 52 हेक्टेयर सिंचित भूमि बंजर होने के कगार पर पहुंच गई है।
गत गत 3/4 अगस्त की रात को कोटद्वार के जंगलों में बादल फटने से कोटद्वार शहर समेत भाबर में तबाही मची थी। पनियाली गदेरे के साथ ही गिवईं स्रोत, खोह नदी, सुखरो, मालन से लेकर तेलीस्रोत तक उफनाए नदी नालों ने भाबर को तहस-नहस कर दिया। लोगों के खेत, खलिहान, सड़क, पैदल मार्ग, सिंचाई गूलें और बड़ी नहरें टूटकर नदी में समा गईं और कई स्थानों पर मलबे से पट गईं। सिंचाई विभाग ने मालन, खोह और अन्य नदियों से निकली नहरों पर सिंचाई व्यवस्था बहाल कर दी, लेकिन वह गिवईं स्रोत नहर को भूल बैठी। करीब 2.4 किमी लंबी इस नहर से अपर कालाबड़ और आसपास के गांवों की करीब 52 हेक्टेयर भूमि सिंचित होती है। कोटद्वार के अपर कालाबड़ निवासी राज्य के पूर्व सूचना आयुक्त और वरिष्ठ पत्रकार प्रभात डबराल भी सरकारी मशीनरी की कार्यप्रणाली से हैरत में हैं। ग्रामीण आशीष बड़थ्वाल, सुधीर चौधरी, सुनील धस्माना व सुरेश कोटनाला का कहना है कि साढ़े तीन महीने से गिवईं स्रोत नहर सूखी पड़ी है। नदी से करीब एक किमी का पैच मलबे से पटा है। सिंचाई व्यवस्था बहाल न होने से काश्तकारों के चेहरे मुरझाए हुए हैं। पहले धान की फसल चौपट हुई। इससे सिंचाई व्यवस्था बहाल होने की आस में लोगों ने उड़द, मंडुआ और अन्य फसलें बो दीं, लेकिन अब तक नहर पर पानी न चलना गंभीर लापरवाही को दर्शाता है।
आपदा के बाद विभाग की प्राथमिकता बड़े क्षेत्रफल वाली नहरों पर सिंचाई व्यवस्था बहाल करना रहा। सभी नहरों की मरम्मत का आगणन प्रशासन के माध्यम से सरकार को भेजा गया है, लेकिन बजट न मिलने से ठेकेदारों ने उधार में काम करने से हाथ खड़े कर दिए हैं।
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-सीपी भट्ट, सहायक अभियंता सिंचाई विभाग कोटद्वार।
फोटो
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गत गत 3/4 अगस्त की रात को कोटद्वार के जंगलों में बादल फटने से कोटद्वार शहर समेत भाबर में तबाही मची थी। पनियाली गदेरे के साथ ही गिवईं स्रोत, खोह नदी, सुखरो, मालन से लेकर तेलीस्रोत तक उफनाए नदी नालों ने भाबर को तहस-नहस कर दिया। लोगों के खेत, खलिहान, सड़क, पैदल मार्ग, सिंचाई गूलें और बड़ी नहरें टूटकर नदी में समा गईं और कई स्थानों पर मलबे से पट गईं। सिंचाई विभाग ने मालन, खोह और अन्य नदियों से निकली नहरों पर सिंचाई व्यवस्था बहाल कर दी, लेकिन वह गिवईं स्रोत नहर को भूल बैठी। करीब 2.4 किमी लंबी इस नहर से अपर कालाबड़ और आसपास के गांवों की करीब 52 हेक्टेयर भूमि सिंचित होती है। कोटद्वार के अपर कालाबड़ निवासी राज्य के पूर्व सूचना आयुक्त और वरिष्ठ पत्रकार प्रभात डबराल भी सरकारी मशीनरी की कार्यप्रणाली से हैरत में हैं। ग्रामीण आशीष बड़थ्वाल, सुधीर चौधरी, सुनील धस्माना व सुरेश कोटनाला का कहना है कि साढ़े तीन महीने से गिवईं स्रोत नहर सूखी पड़ी है। नदी से करीब एक किमी का पैच मलबे से पटा है। सिंचाई व्यवस्था बहाल न होने से काश्तकारों के चेहरे मुरझाए हुए हैं। पहले धान की फसल चौपट हुई। इससे सिंचाई व्यवस्था बहाल होने की आस में लोगों ने उड़द, मंडुआ और अन्य फसलें बो दीं, लेकिन अब तक नहर पर पानी न चलना गंभीर लापरवाही को दर्शाता है।
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आपदा के बाद विभाग की प्राथमिकता बड़े क्षेत्रफल वाली नहरों पर सिंचाई व्यवस्था बहाल करना रहा। सभी नहरों की मरम्मत का आगणन प्रशासन के माध्यम से सरकार को भेजा गया है, लेकिन बजट न मिलने से ठेकेदारों ने उधार में काम करने से हाथ खड़े कर दिए हैं।
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-सीपी भट्ट, सहायक अभियंता सिंचाई विभाग कोटद्वार।
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