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आसान नहीं रहा हिमालयी कुंभ का आयोजन
कर्णप्रयाग/विनय बहुगुणा
Updated Sun, 04 Aug 2013 10:02 AM IST
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हिमालय महाकुंभ श्रीनंदा राजजात उत्तरराखंड व भारतवर्ष में ही नहीं वरन विदेशों में भी ख्याती प्राप्त कर चुकी है। इसकी महत्ता से प्रभावित होकर विदेशियों ने भी यहां आकर अपने शोघ से इसकी धार्मिक महत्ता को सात समुद्र पार अपने लोगों तक भी पहुंचाया।
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यही कारण है कि 21वीं सदी में श्रीनंदा राजजात उत्तरी अमेरिका से लेकर जापान और जर्मनी जैसे देशों में भी अपना विशेष महत्व रखती है। गढ़-कुमाऊं में श्रीनंदा देवी राजजात देव व मनुष्यों की आत्मिक भावनाओं का प्रतीक है।
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इसकी महत्ता से देवभूमि के साथ-साथ पाश्चात्य संस्कृति के लोग भी प्रभावित हुए हैं। यही नही वे मां नंदा की भक्ति में मानों रच-बस से गए। मां नंदा को मायके से ससुराल विदा करने की धार्मिक यात्रा को राजजात कहा जाता है।
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विश्वस्तर पर पहचान
राजजात की महत्ता से रुबरु होकर उत्तरी अमेरिका के एक पहाड़ी गांव से अस्सी के दशक में आए डा. विलियम एस एक्स ने इसे विश्वस्तर पर पहचान दिलाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
डा. विलियम ने आक्सपोर्ड यूनिर्वसिटी में एक पुस्तक में श्रींनदा राजजात के बारे में पढ़ा। वे इससे काफी प्रभावित हुए और वर्ष 1980-81 के दौरान उत्तराखंड (तब यूपी) के जनपद चमोली के नौटी क्षेत्र पहुंचे। यहां से उन्होंने सिद्वपीठ कुरुड, रुपकुंड से लेकर राजजात से जुड़े कई प्रसिद्व स्थानों में पहुंचकर शोध से जानकारियां जुटाई।
माउंटेन गाडे्स शीर्षक से पुस्तक
वर्ष 1981 से 86 तक किए गए गहन शोध और वर्ष 1987 में श्रीनंदा राजजात में शामिल होने के बाद डा. विलियम ने वर्ष 1991 में माउंटेन गाडे्स शीर्षक से पुस्तक लिखी। इस पुस्तक में उन्होंने राजजात को पाश्चात्य देशों में विशेष ख्याती दिलाई।
उन्होंने एचएनबीकेविवि श्रीनगर के लोक संस्कृति एवं कला निस्पादन केंद्र के पूर्व निदेशक प्रो. डीआर पुरोहित के साथ वर्ष 2000 की राजजात पर श्रीनंदा राजजात 2000 ड्रामा भी लिखा। इस ड्रामे का मंचन जर्मनी के हैंजिलवर्ग विवि में प्रो. पुरोहित के निर्देशन में हो चुका है। वर्तमान में डा. विलियम इसी कालेज में मानव शास्त्र के प्रोफेसर पद पर कार्यरत हैं।
श्री पुरोहित बताते हैं कि डा. विलियम ने श्रीनंदा राजजात के हर पहलु पर कार्य करते हुए अपने लेखन के जरिये इसे दुनियाभर में प्रचारित करने का कार्य किया है। कहते हैं कि उन्होंने अपनी पुस्तक माउंटेशन गाडे्स में राजजात को नंदा के ससुराल में उसकी संघर्षो की कहानी के रुप में वर्णित किया है।
रुपकुंड के कंकालों से भी उठाया पर्दा
प्रो. डीआर पुरोहित बताते हैं कि डा. विलियम ने जनपद चमोली के ऊपरी हिमालय क्षेत्र में स्थित रुपकुंड के मानव कंकालों के रहस्य से भी पर्दा उठाया। उन्होंने वर्ष 2004 में द स्क्लेटन लेट नाम से एक डाक्यूमेंट्ररी बनाई।
इसमें उन्होंने इन कंकालों को 12 सौ साल पुराना बताते हुए मौत का कारण ओलावृष्टि बताया गया है। श्री पुरोहित बताते हैं कि ये तथ्य इनसाइक्लोपीडिया द हिंदुइज्म में भी मौजूद हैं।
इनका कहना है
श्रीनंदा राजजात को दुनियाभर में अनूठी प्रसिद्ध दिलाने के लिए सात समुंद्र पार से यहां पहुंचकर डा. विलियम एस सेक्स ने लोक संस्कृति में रच-बस कर अनूठा कार्य किया है। वे यहां की संस्कृति से इस कदर प्रभावित हुए कि उन्होंने अपना नाम बदरी प्रसाद नौटियाल ही रख लिया था।
--प्रो. डीआर पुरोहित पूर्व निदेशक लोक संस्कृति एवं कला निस्पादन केंद्र एचएनबीकेविवि श्रीनगर गढ़वाल