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देवोत्थान एकादशी: शिव चले कैलाश, जगत में अब विष्णु का साम्राज्य, हरिद्वार में स्नान के लिए उमड़े लोग

Sun, 14 Nov 2021 01:42 PM IST
देहरादून ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, हरिद्वार
संवाद न्यूज एजेंसी, हरिद्वार Published by: देहरादून ब्यूरो Updated Sun, 14 Nov 2021 01:42 PM IST
सार

एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक चलने वाली देव दीपावली इंद्रलोक और काशी में प्रारंभ हो गई है। शिव कैलाश लौट चले गए हैं और धरती पर विवाह आदि मांगलिक कार्य प्रारंभ हो गए हैं।

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Shiva went to Kailash and now the kingdom of Vishnu in the world
haridwar, snan, ganga snan - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आषाढ़ शुक्ल एकादशी से प्रारंभ हुआ भगवान शंकर का चार महीने चला साम्राज्य अब समाप्त हो गया है। राजा बली को दिया वचन निभाने पाताल गए विष्णु ने आज बाहर आकर इस चराचर जगत का कार्यभार संभाल लिया है। देवोत्थान एकादशी पर कांसे का थाल बजाकर विष्णु को योगनिद्रा से जगाया गया। विष्णु के साथ सुप्तावस्था में गए अन्य देवता भी जग गए। इसी क्रम में रविवार को एकादशी के मौके पर हरिद्वार में लोग गंगा स्नान के लिए पहुंचे और पवित्र डुबकी लगाई।

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इंद्रलोक और काशी में प्रारंभ हो जाएगी देव दीपावली
एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक चलने वाली देव दीपावली इंद्रलोक और काशी में प्रारंभ हो जाएगी। शिव कैलाश लौट चले गए हैं और धरती पर विवाह आदि मांगलिक कार्य प्रारंभ हो गए हैं। इसी के साथ चार महीने चलने वाला संतों का चातुर्मास भी संपन्न हो गया है। देवताओं का शयन विष्णु के साथ होता है और जागरण भी। इन चार महीनों में भगवान शंकर इस ब्रह्मांड का संचालन अकेले करते हैं। इसके विपरीत विष्णु यह संचालन देवों की मदद से करते आए हैं। इस बार आषाढ़ शुक्ल एकादशी 20 जुलाई को थी जब विष्णु शयन को गए थे।

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रविवार 14 नवंबर को जागरण के साथ ही जगत रचियता विष्णु भगवान ने लक्ष्मी और अन्य देवताओं के सहयोग से संपूर्ण चराचर का संचालन शुरू कर दिया। धरतीवासी इस दिन घरों के आंगन में भीगे चावल के ऐपण से विष्णु आदि देवों की श्वेत रंगोली तैयार करते हैं। फर्श पर बनाई विष्णु अनुकृति के ऊपर कांसे का थाल उलटकर रख दिया जाता है। श्रद्धालु दिनभर व्रत रखकर थाल को मूली या गन्ने से बजाते हुए विष्णु को जगाते हैं। देव जागरण के दिन सुस्वादु भोजन घर घर बनाया जाता है। विष्णु के जगते ही कर्ण छेदन, मुंडन, यगोपवीत, सगाई, विवाह, वाग्दान संस्कार प्रारंभ हो जाते हैं।

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पौराणिक पंडित हरिओम जयवाल शास्त्री ने बताया कि यग्योपवीत संस्कार के लिए मकर संक्रांति से शुरू होने वाले उत्तरायण की प्रतीक्षा जरूरी है। विवाह संस्कार में विष्णु, शुक्र और बृहस्पति की उपस्थिति अनिवार्य है। मान्यता है कि ब्रह्मलोक, स्वर्ग और इंद्रलोक में इसी दिन से देव दीपावली प्रारंभ होती है। देव जागरण के साथ ही परिव्राजक साधु, संन्यासी, वैष्णव, रामानंदी, उदासी और निर्मल यात्राओं पर निकल पड़ते हैं।


देवशयन से देवजागरण तक के चारमास संतों के

देवशयन से देवजागरण तक के चारमास संतों के ज्ञान, साधना और तपस्या के दिन हैं। चार महीनों में अर्जित ज्ञान का वितरण संत समाज आठ महीनों तक देशाटन के माध्यम से देशभर में करता है। देवोत्थान एकादशी से शुरू हुई देवदीपावली कार्तिक पूर्णिमा के दिन विश्राम लेगी।

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