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संस्कृत का हो रहा है निरंतर विकास: प्रो त्रिपाठी
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श्री भगवानदास आदर्श संस्कृत महाविद्यालय में संस्कृत के नाटकों की निर्बाध परंपरा विषय पर परिसंवाद में
केंद्रीय संस्कृत विवि के पूर्व कुलपति प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी ने कहा कि संस्कृत का नाटकों एवं महाकाव्यों से निरंतर विकास हो रहा है। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र से नाटकों की परंपरा प्रचलित हुई। वर्तमान में 150 से अधिक नाट्य ग्रंथ उपलब्ध हैं।
उन्होंने कहा कि लाखों संस्कृत ग्रंथों की पांडुलिपियां ब्रिटिशकाल में लुप्त हुई। आज भी पांडुलिपियों के संरक्षण के लिए सरकार की कोई विशिष्ट योजना नहीं है। हमारे अनेक ग्रंथ सुरक्षा के अभाव में नष्ट हो रहे हैं। संस्कृत साहित्य का अपकर्ष कभी नहीं हुआ है। कुछ विदेशी विद्वानों ने हमें नीचा दिखाने के लिए ऐसा कुचक्र चलाया है। संस्कृत नाटकों की परंपरा वेदों से प्रादुर्भूत हुई है। उन्होंने कहा कि संस्कृत के नाटकों के विकास के लिए रामायण एवं महाभारत का बहुत बड़ा योगदान है। कार्यक्रम की अध्यक्षता साहित्य अकादमी पुरस्कृत डॉ. निरंजन मिश्र ने की। इस अवसर पर प्रभारी प्राचार्य डॉ. बृजेंद्र कुमार सिंह, डॉ. शैलेश तिवारी, डॉ. अरुण मिश्र, डॉ. वेदव्रत, डॉ. आशिमा श्रवण, डॉ. मंजु पटेल, गौरव असवाल, मनोज गिरि, एकता आदि मौजूद रहे।
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केंद्रीय संस्कृत विवि के पूर्व कुलपति प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी ने कहा कि संस्कृत का नाटकों एवं महाकाव्यों से निरंतर विकास हो रहा है। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र से नाटकों की परंपरा प्रचलित हुई। वर्तमान में 150 से अधिक नाट्य ग्रंथ उपलब्ध हैं।
उन्होंने कहा कि लाखों संस्कृत ग्रंथों की पांडुलिपियां ब्रिटिशकाल में लुप्त हुई। आज भी पांडुलिपियों के संरक्षण के लिए सरकार की कोई विशिष्ट योजना नहीं है। हमारे अनेक ग्रंथ सुरक्षा के अभाव में नष्ट हो रहे हैं। संस्कृत साहित्य का अपकर्ष कभी नहीं हुआ है। कुछ विदेशी विद्वानों ने हमें नीचा दिखाने के लिए ऐसा कुचक्र चलाया है। संस्कृत नाटकों की परंपरा वेदों से प्रादुर्भूत हुई है। उन्होंने कहा कि संस्कृत के नाटकों के विकास के लिए रामायण एवं महाभारत का बहुत बड़ा योगदान है। कार्यक्रम की अध्यक्षता साहित्य अकादमी पुरस्कृत डॉ. निरंजन मिश्र ने की। इस अवसर पर प्रभारी प्राचार्य डॉ. बृजेंद्र कुमार सिंह, डॉ. शैलेश तिवारी, डॉ. अरुण मिश्र, डॉ. वेदव्रत, डॉ. आशिमा श्रवण, डॉ. मंजु पटेल, गौरव असवाल, मनोज गिरि, एकता आदि मौजूद रहे।
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