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लाइनों में लगकर गुजारने पड़ रहे ‘अच्छे दिन‘

Mon, 12 Dec 2016 12:03 AM IST
hridwar uttrakhanda india
hridwar uttrakhanda india Updated Mon, 12 Dec 2016 12:03 AM IST
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Lines had to spend are pressed in the 'good day'
लाइन में कट रहे अच्छे दिन - फोटो : अमर उजाला

नौकरी पेशा, रिटायर्ड कर्मचारी, व्यापारी और किसान से लेकर दिहाड़ी मजदूर तक सब बेहाल हैं। कारण, नोटबंदी सबकी जेब पर भारी है। नोटबंदी से काला धन बाहर निकला या नहीं, आम जनता को इससे खास मतलब नहीं है, दिक्कत ये है कि अपनी मेहनत और खून पसीने की कमाई भी खातों से नहीं निकाल पा रहे हैं। इस मलाल के साथ लोगों को अच्छे दिन बैंक व एटीएम के बाहर लंबी लंबी लाइनों में लगकर गुजारने पड़ रहे हैं।

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आठ नवंबर को प्रधानमंत्री की घोषणा के साथ एक हजार और पांच सौ रुपये के नोट बंद होने पर लोगों को दावों के साथ उम्मीद बंधी थी कि जल्द ही सबकुछ सामान्य हो जाएगा। इसी उम्मीद के सहारे रेंग रेंगकर एक महीना गुजर गया, मगर बैंकों और एटीएम के बाहर लाइन छोटी नहीं हुई। दावे भले ही कुछ भी हों, पर धरातल पर आम आदमी नगदी के लिए जूझता दिखाई दे रहा है। कोई भी वर्ग इससे अछूता नहीं है। रविवार को चंद्राचार्य चौक स्थित विजया बैंक एटीएम के बाहर सुबह छह बजे से लाइन में लगे इंजीनियर एके चटर्जी नोटबंदी से असर की बाबत पूछते ही प्रधानमंत्री मोदी पर बरस पड़ते हैं। उन्हें इस बात का मलाल रहा कि अपनी मेहनत की कमाई भी खाते से निकालने के लिए ठंड में ठिठुरना पड़ रहा है। इंजीनियर चटर्जी का कहना था कि क्या यही अच्छे दिन हैं कि लोग सारे काम धंधे छोड़कर रात दिन लाइनों में खड़े हैं।
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सिडकुल की एक फैक्ट्री में कार्यरत कानपुर निवासी विपिन ने बताया कि तनख्वाह खाते से निकल नहीं पा रही है। अब दुकानदार ने भी उधार राशन देने से साफ मना कर दिया। इसलिए सुबह छह बजे दिन निकलने से पहले आकर लाइन में लगा हूं। लाइन में लगे बाकी लोगों की भी कमोबेश यही परेशानी थी। सचिन, नंदलाल, उमेश कुमार आदि ने इस बात पर भी सवाल उठाए कि अभी तक कोई नेता या मंत्री उन्होंने लाइन में लगते नहीं देखा और करोड़ों की तादाद में नए नोट भी नेताओं के पास से बरामद हो रहे हैं।
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नोटबंदी की भेंट चढ़ रही रविवार की छुट्टी
नौकरीपेशा वर्ग के लिए रविवार का दिन खास होता है। साप्ताहिक छुट्टी  को वे परिवार के साथ मौज मस्ती, शॉपिंग आदि में बिताना चाहते हैं। नोटबंदी के बाद से नौकरी पेशा वर्ग को हर संडे लाइन में लगने का काम बचा है। भेल में इंजीनियरिंग की ट्रेनिंग कर रहे हरदोई यूपी निवासी अक्षत और शाहजहांपुर यूपी के शिवेंद्र त्रिपाठी ने बताया कि उन्होंने कमरा भी किराये पर लिया हुआ है। रोजाना खाने पीने से लेकर तमाम खर्चे नगदी के बिना संभव नहीं है। हर संडे सोचते हैं कि हरिद्वार आए हैं तो हरकी पैड़ी, मनसा देवी जैसे मंदिरों में दर्शन करने जाएंगे, या फिर कहीं और घूमने फिरने चलेंगे। मगर हफ्ते में निकलने वाले दो हजार रुपये सप्ताह पूरा होने से पहले ही खत्म हो जाते हैं, अगले रविवार फिर से लाइन में लगना पड़ता है। लाइन में लगे सिडकुल के तमाम कर्मचारियों ने भी अपनी कुछ ऐसी ही परेशानी बयान की।

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