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गंगा के लिए नासूर बन रही बस्तियां
अमर उजाला ब्यूरो हरिद्वार
Updated Sun, 04 Dec 2016 10:44 PM IST
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धर्मनगरी में गंगा के लिए डामकोठी से लेकर जटवाड़ा पुल तक गंगनहर किनारे बसी अवैध बस्तियां गंगा के लिए नासूर साबित हो रही हैं। इन बस्तियों की सीवर की गंदगी से लेकर कूड़ा कचरा तक सीधे गंगा में गिर रहा है। वोट बैंक के नाते खुला राजनीतिक संरक्षण होने के चलते इन बस्तियों पर मालिकाना हक रखने वाला सिंचाई विभाग तो क्या प्रशासन भी हाथ नहीं डाल पाता। गंगा को मैली करने में राजनीतिक दलों की भूमिका भी क्लीन नहीं है।
सरकार और तमाम गैरसरकारी संस्थाएं गंगा को स्वच्छ बनाने के लिए दावे करते हैं। दफ्तरों में हजारों करोड़ की योजनाएं बनाने से लेकर विचार गोष्ठियों तक में गंगा की दुर्दशा पर चिंता जताई जाती है। इन दावों और प्रयासों का आधा हिस्सा भी धरातल पर उतारा जाए तो गंगा को एक हद तक प्रदूषित होने से बचाया जा सकता है। धर्मनगरी में ही गंगा की इस कदर बदहाली है कि होटल, धर्मशालाओं, आश्रमों की गंदगी गंगा को दिन प्रतिदिन मैली कर रही है। रही कसर गंगनहर किनारे बसी अवैध बस्तियां पूरी कर रही है। मायापुर से लेकर जटवाड़ा पुल तक यूपी सिंचाई विभाग की भूमि पर बसी राजीव नगर कालोनी, लाल मंदिर कालोनी बस्ती, सोनिया बस्ती जैसी आधा दर्जन से ज्यादा घनी आबादी वाली अवैध बस्तियां गंगा की पवित्रता को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रही हैं। अलग अलग राजनीतिक दलों के संरक्षण से वजूद में आई बस्तियों की सीवर की गंदगी हो या निकासी का गंदा पानी सबकुछ गंगा में डाला जा रहा है। इतना नहीं रोजमर्रा का कूड़ा कचरा, पॉलीथिन आदि भी गंगा में फेंका जा रहा है।
नहर किनारे पशु पालन, गोबर गंगा में
बस्तियों से गंगा किस कदर मैली हो रही है, इसका अंदाजा गंगा के दूसरे छोर पर खड़े होकर आसानी से लगाया जा सकता है। बस्तियों का मल-मूत्र से लेकर कूड़ा कचरा तो गंगा में गिर ही रहा है। कई जगहों पर गंगा किनारे पर पशु पालन किया जा रहा है। जिनका गोबर व गंदगी भी गंगा में बहा दी जाती है। नगर निगम या स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी भी खुले में चल रही डेयरियों पर कार्रवाई की जहमत नहीं उठाना चाहते। जटवाड़ा पुल के आस पास सुअर पालन तक गंगा किनारे किया जा रहा है।
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सभी दलों का संरक्षण
अवैध बस्तियों को राजनीतिक दलों का मामूली संरक्षण प्राप्त नहीं है, मध्य हरिद्वार से लेकर लाल मंदिर कालोनी तक अवैध बस्तियों में एक दल का वर्चस्व है तो जटवाड़ा पुल तक बसी बाकी बस्तियां दूसरी पार्टी का गढ़ हैं। यूपी सिंचाई विभाग यदा कदा अतिक्रमण हटाने का प्रयास भी करता है तो राजनीतिक दल अपना वोट बैंक बचाने के लिए जेसीबी के सामने तक लेट जाते हैं। अवैध बस्तियों में कई जगहों पर पानी सीवर की लाइन भी इसी राजनीतिक संरक्षण की देन है।
सरकार और तमाम गैरसरकारी संस्थाएं गंगा को स्वच्छ बनाने के लिए दावे करते हैं। दफ्तरों में हजारों करोड़ की योजनाएं बनाने से लेकर विचार गोष्ठियों तक में गंगा की दुर्दशा पर चिंता जताई जाती है। इन दावों और प्रयासों का आधा हिस्सा भी धरातल पर उतारा जाए तो गंगा को एक हद तक प्रदूषित होने से बचाया जा सकता है। धर्मनगरी में ही गंगा की इस कदर बदहाली है कि होटल, धर्मशालाओं, आश्रमों की गंदगी गंगा को दिन प्रतिदिन मैली कर रही है। रही कसर गंगनहर किनारे बसी अवैध बस्तियां पूरी कर रही है। मायापुर से लेकर जटवाड़ा पुल तक यूपी सिंचाई विभाग की भूमि पर बसी राजीव नगर कालोनी, लाल मंदिर कालोनी बस्ती, सोनिया बस्ती जैसी आधा दर्जन से ज्यादा घनी आबादी वाली अवैध बस्तियां गंगा की पवित्रता को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रही हैं। अलग अलग राजनीतिक दलों के संरक्षण से वजूद में आई बस्तियों की सीवर की गंदगी हो या निकासी का गंदा पानी सबकुछ गंगा में डाला जा रहा है। इतना नहीं रोजमर्रा का कूड़ा कचरा, पॉलीथिन आदि भी गंगा में फेंका जा रहा है।
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नहर किनारे पशु पालन, गोबर गंगा में
बस्तियों से गंगा किस कदर मैली हो रही है, इसका अंदाजा गंगा के दूसरे छोर पर खड़े होकर आसानी से लगाया जा सकता है। बस्तियों का मल-मूत्र से लेकर कूड़ा कचरा तो गंगा में गिर ही रहा है। कई जगहों पर गंगा किनारे पर पशु पालन किया जा रहा है। जिनका गोबर व गंदगी भी गंगा में बहा दी जाती है। नगर निगम या स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी भी खुले में चल रही डेयरियों पर कार्रवाई की जहमत नहीं उठाना चाहते। जटवाड़ा पुल के आस पास सुअर पालन तक गंगा किनारे किया जा रहा है।
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सभी दलों का संरक्षण
अवैध बस्तियों को राजनीतिक दलों का मामूली संरक्षण प्राप्त नहीं है, मध्य हरिद्वार से लेकर लाल मंदिर कालोनी तक अवैध बस्तियों में एक दल का वर्चस्व है तो जटवाड़ा पुल तक बसी बाकी बस्तियां दूसरी पार्टी का गढ़ हैं। यूपी सिंचाई विभाग यदा कदा अतिक्रमण हटाने का प्रयास भी करता है तो राजनीतिक दल अपना वोट बैंक बचाने के लिए जेसीबी के सामने तक लेट जाते हैं। अवैध बस्तियों में कई जगहों पर पानी सीवर की लाइन भी इसी राजनीतिक संरक्षण की देन है।