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छठ मइया से बेटी और जल बचाने की श्रद्धालु लगाते हैं गुहार
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छठ पूजा वास्तविक रूप में प्रकृति की पूजा है। इस अवसर पर सूर्य की पूजा होती है, जिन्हें एक मात्र ऐसा भगवान माना जाता है जो प्रत्यक्ष हैं यानी दिखते हैं। छठ व्रतियों का कहना है कि छठ पूजा के मौके पर नदियां, तालाब, जलाशयों के किनारे पूजा की जाती है जो सफाई की प्रेरणा देती है। यह पर्व नदियों को प्रदूषण मुक्त बनाने की प्रेरणा देता है। इस पर्व में केला, सेब, गन्ना सहित कई फलों की प्रसाद के रूप में पूजा होती है जिन से वनस्पति की महत्ता का पता चलता है।
पारंपरिक गीत अब सिर्फ छठ पर्व में ही सुनाई देते हैं। गांव से शहर व घर से लेकर गंगा घाटों तक गीत बजते हैं। देश में छठ पूजा की धूम है। छठ गीत में न सिर्फ पूजा की बात होती है, बल्कि इसमें परंपरा, सामाजिकता के साथ श्रद्धालुओं की प्रकृति व भगवान के साथ संवाद भी दिखता है। छठ गीतों को सुनने पर पता चलता है कि हमारी परंपरा में बेटी और जल दोनों का काफी महत्व है। श्रद्धालु छठ मैया से बेटी मांगते हैं। साथ ही अच्छा व पढ़ा-लिखा दामाद, ताकि बुढ़ापे में बेटी-दामाद उन्हें तीर्थ करा सकें। बेटा यश और वंश वृद्धि के लिए मांगा जाता है, वहीं बहू सेवा करने के लिए।
गीतों में ससुराल में हो रही परेशानी से भी छठी मैया को अवगत कराया जाता है। छठ व्रती किरण सिंह बताती हैं कि गीतों में छठ मैया से निरोग रहने और वंश में वृद्धि की मांग की जाती है। व्रती और छठ मैया के बीच संवाद पर आधारित गाना भी काफी प्रचलित है। जब श्रद्धालु देरी से आने का कारण भी पूछते हैं तो छठ मैया बताती हैं कि वह अंधे को आंख, कोढ़ी को काया, बांझ की गोद भरते हुए आ रही थीं। इसलिए आने में देर हुई। संवाद
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गंगा सहित कई नदियों का वर्णन
नारायण ज्योतिष संस्थान के विकास जोशी ने बताया कि छठ गीतों में आध्यात्मिकता और सामाजिकता, दोनों भरा हुआ है। गीतों में गंगा, कोसी, नदी व पोखर का भी जिक्र आता है। यानी कि पानी के संरक्षण की बात कही गई है। नदी और तालाब के बिना यह पर्व अधूरा माना जाता है। हर भाषा में छठ के गीत गाए जाते हैं। इसमें जगह, नदी और तालाब का नाम बदलता है। मांग और आशीष एक ही रहता है।
भारतीय प्राच्य विद्या सोसाइटी के प्रतीक मिश्रपुरी ने बताया कि छठ करने से निसंतान दपंती को पुत्र की प्राप्ति होती है। साथ ही उनकी संतान की जिंदगी सुखी होती है। आधुनिकता की इस दौर में भले ही छठ पूजा में भी नया रंग देखने को मिलता हो पर आज भी छठ को लेकर लोगों में वही श्रद्धा दिखाई देती है।
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पारंपरिक गीत अब सिर्फ छठ पर्व में ही सुनाई देते हैं। गांव से शहर व घर से लेकर गंगा घाटों तक गीत बजते हैं। देश में छठ पूजा की धूम है। छठ गीत में न सिर्फ पूजा की बात होती है, बल्कि इसमें परंपरा, सामाजिकता के साथ श्रद्धालुओं की प्रकृति व भगवान के साथ संवाद भी दिखता है। छठ गीतों को सुनने पर पता चलता है कि हमारी परंपरा में बेटी और जल दोनों का काफी महत्व है। श्रद्धालु छठ मैया से बेटी मांगते हैं। साथ ही अच्छा व पढ़ा-लिखा दामाद, ताकि बुढ़ापे में बेटी-दामाद उन्हें तीर्थ करा सकें। बेटा यश और वंश वृद्धि के लिए मांगा जाता है, वहीं बहू सेवा करने के लिए।
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गीतों में ससुराल में हो रही परेशानी से भी छठी मैया को अवगत कराया जाता है। छठ व्रती किरण सिंह बताती हैं कि गीतों में छठ मैया से निरोग रहने और वंश में वृद्धि की मांग की जाती है। व्रती और छठ मैया के बीच संवाद पर आधारित गाना भी काफी प्रचलित है। जब श्रद्धालु देरी से आने का कारण भी पूछते हैं तो छठ मैया बताती हैं कि वह अंधे को आंख, कोढ़ी को काया, बांझ की गोद भरते हुए आ रही थीं। इसलिए आने में देर हुई। संवाद
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गंगा सहित कई नदियों का वर्णन
नारायण ज्योतिष संस्थान के विकास जोशी ने बताया कि छठ गीतों में आध्यात्मिकता और सामाजिकता, दोनों भरा हुआ है। गीतों में गंगा, कोसी, नदी व पोखर का भी जिक्र आता है। यानी कि पानी के संरक्षण की बात कही गई है। नदी और तालाब के बिना यह पर्व अधूरा माना जाता है। हर भाषा में छठ के गीत गाए जाते हैं। इसमें जगह, नदी और तालाब का नाम बदलता है। मांग और आशीष एक ही रहता है।
भारतीय प्राच्य विद्या सोसाइटी के प्रतीक मिश्रपुरी ने बताया कि छठ करने से निसंतान दपंती को पुत्र की प्राप्ति होती है। साथ ही उनकी संतान की जिंदगी सुखी होती है। आधुनिकता की इस दौर में भले ही छठ पूजा में भी नया रंग देखने को मिलता हो पर आज भी छठ को लेकर लोगों में वही श्रद्धा दिखाई देती है।