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निर्जला एकादशी पर श्रद्धालुओं ने गंगा में लगाई डुबकी
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ब्यूरो/अमर उजाला, हरिद्वार
गंगा दशहरे से अगले दिन बृहस्पतिवार को लाखों श्रद्धालुओं ने निर्जला एकादशी पर स्नान किया। इसके बाद दान पुण्य किया। विशेष रूप से हाथ के पंखे, फल-फूल का दान श्रद्धालुओं ने किया। धर्मनगरी में विभिन्न स्थानों पर छबील लगाकर श्रद्घालुओं को शीतल और मीठा शरबत पिलाया गया।
निर्जला एकादशी पर श्रद्धालु जल भी ग्रहण नहीं करते। स्नान करने के बाद निर्जल रहकर शीतल पेय दान करते हैं। मान्यता के अनुसार, निर्जला एकादशी के दिन दिया गया दान कभी निष्फल नहीं जाता। वर्ष की 24 एकादशियों में निर्जला एकादशी का अधिक महत्व माना जाता है। इस दिन देशभर में श्रद्धालु अपनी बहन-बेटियों को भी मिठाई और शीतल पेय भेजते हैं। निर्जला एकादशी के दिन बिना जल पिये और अन्न ग्रहण किए व्रत रखने से कई लाभ मनुष्य को प्राप्त होते हैं। किसी भी एकादशी के दिन चावल का भोजन निषिद्ध बताया गया है। केवल भगवान जगन्नाथ के उपासक एकादशी पर चावल का बंधन नहीं मानते। अलबत्ता देश में अंयत्र कहीं भी चावल का दान निर्जला एकादशी पर नहीं किया जाता। समय बदलने के साथ-साथ पर्व का स्वरूप भी बदलता जा रहा है। अब लोग हाथ के पंखों के बजाय अपनी बहन-बेटियों को एसी तक दान में देते हैं। पहले हरिद्वार में गंगा स्नान के बाद मिट्टी की सुराही में जलभर कर दान की परंपरा थी। बदलते दौर में सुराही निर्जला एकादशी के दिन भी नजर नहीं आया। निर्जला एकादशी का स्नान सवेरे पांच बजे शुरू हो गया था। भारी भीड़ के चलते यातायात प्रबंधों को नियंत्रित किया गया। दोपहर 12 बजे के बाद हालात सामान्य होने लगे। स्नान के बाद सायंकाल से धर्मनगरी फिर खाली होने लगी है।
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गंगा दशहरे से अगले दिन बृहस्पतिवार को लाखों श्रद्धालुओं ने निर्जला एकादशी पर स्नान किया। इसके बाद दान पुण्य किया। विशेष रूप से हाथ के पंखे, फल-फूल का दान श्रद्धालुओं ने किया। धर्मनगरी में विभिन्न स्थानों पर छबील लगाकर श्रद्घालुओं को शीतल और मीठा शरबत पिलाया गया।
निर्जला एकादशी पर श्रद्धालु जल भी ग्रहण नहीं करते। स्नान करने के बाद निर्जल रहकर शीतल पेय दान करते हैं। मान्यता के अनुसार, निर्जला एकादशी के दिन दिया गया दान कभी निष्फल नहीं जाता। वर्ष की 24 एकादशियों में निर्जला एकादशी का अधिक महत्व माना जाता है। इस दिन देशभर में श्रद्धालु अपनी बहन-बेटियों को भी मिठाई और शीतल पेय भेजते हैं। निर्जला एकादशी के दिन बिना जल पिये और अन्न ग्रहण किए व्रत रखने से कई लाभ मनुष्य को प्राप्त होते हैं। किसी भी एकादशी के दिन चावल का भोजन निषिद्ध बताया गया है। केवल भगवान जगन्नाथ के उपासक एकादशी पर चावल का बंधन नहीं मानते। अलबत्ता देश में अंयत्र कहीं भी चावल का दान निर्जला एकादशी पर नहीं किया जाता। समय बदलने के साथ-साथ पर्व का स्वरूप भी बदलता जा रहा है। अब लोग हाथ के पंखों के बजाय अपनी बहन-बेटियों को एसी तक दान में देते हैं। पहले हरिद्वार में गंगा स्नान के बाद मिट्टी की सुराही में जलभर कर दान की परंपरा थी। बदलते दौर में सुराही निर्जला एकादशी के दिन भी नजर नहीं आया। निर्जला एकादशी का स्नान सवेरे पांच बजे शुरू हो गया था। भारी भीड़ के चलते यातायात प्रबंधों को नियंत्रित किया गया। दोपहर 12 बजे के बाद हालात सामान्य होने लगे। स्नान के बाद सायंकाल से धर्मनगरी फिर खाली होने लगी है।
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