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संतों और नेताओं को नहीं आई निगमानंद की याद
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ब्यूरो/अमर उजाला, हरिद्वार
गंगा के लिए बलिदान देने वाले मातृसदन के ब्रह्मचारी स्वामी निगमानंद सरस्वती के अंतिम संस्कार के समय आठ साल पहले नेताओं, मंत्रियों, संतों की भारी भीड़ उमड़ी थी। सभी ने गंगा और निगमानंद को लेकर दावों की झड़ी लगा दी थी, लेकिन आज उनके बलिदान दिवस पर न तो कोई जनप्रतिनिधि दिखा और न ही पार्टी के पदाधिकरी आए। संतों की नगरी से भी कोई संत नहीं पहुंचा। किसी को भी गंगा पुत्र की याद नहीं आई।
गंगा की निर्मलता और अविरलता को लेकर 115 दिन तक अनशन करने के बाद ब्रह्मचारी निगमानंद सरस्वती का 13 जून को निधन हुआ था। लंबी जद्दोजहद के बाद दो बार पोस्टमार्टम कराने के पश्चात उनकी पार्थिव देह को मातृसदन को दे दी गई थी। उनके अंतिम संस्कार वाले दिन ब्रह्मचारी निगमानंद सरस्वती को श्रद्धांजलि देने के लिए पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, काबीना मंत्री यशपाल आर्य समेत कई अन्य नेता और कई स्थानीय संत भी पहुंचे थे। सभी ने सरकार की आलोचना की थी और निगमानंद के संकल्प को पूरा कराने के लिए काम करने का दावा किया था। आज वे सब दावे हवा में उड़ गए। अब केवल निगमानंद की यादें बची हैं। बृहस्पतिवार को बलिदान दिवस के मौके पर न तो कोई संत पहुंचा और न ही जनप्रतिनिधि। जिले में 11 विधायक हैं, लेकिन किसी को निगमानंद की समाधि पर श्रद्धा के दो फूल चढ़ाने की याद नहीं आई। मातृसदन के परमाध्यक्ष स्वामी शिवानंद सरस्वती का कहना है कि गंगा के लिए कोई गंभीर नहीं है तो फिर गंगा के लिए बलिदान देने वालों को कौन गंभीरता से लेगा। उन्होंने कहा कि निगमानंद के बलिदान के बाद अंतिम संस्कार के समय सारी देश का मीडिया आश्रम में मौजूद था इसलिए लोग भी आए थे। अब यह मसला प्रचार का मुद्दा नहीं बन सकता तो कोई नहीं आया इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता हम गंगा के लिए लड़ रहे थे, लड़ रहे हैं और लड़ते रहेंगे। मातृसदन और उनकी विचारधारा वाले लोग निगमानंद के संकल्प को पूरा कराने के लिए संघर्ष करते रहेंगे।
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गंगा के लिए बलिदान देने वाले मातृसदन के ब्रह्मचारी स्वामी निगमानंद सरस्वती के अंतिम संस्कार के समय आठ साल पहले नेताओं, मंत्रियों, संतों की भारी भीड़ उमड़ी थी। सभी ने गंगा और निगमानंद को लेकर दावों की झड़ी लगा दी थी, लेकिन आज उनके बलिदान दिवस पर न तो कोई जनप्रतिनिधि दिखा और न ही पार्टी के पदाधिकरी आए। संतों की नगरी से भी कोई संत नहीं पहुंचा। किसी को भी गंगा पुत्र की याद नहीं आई।
गंगा की निर्मलता और अविरलता को लेकर 115 दिन तक अनशन करने के बाद ब्रह्मचारी निगमानंद सरस्वती का 13 जून को निधन हुआ था। लंबी जद्दोजहद के बाद दो बार पोस्टमार्टम कराने के पश्चात उनकी पार्थिव देह को मातृसदन को दे दी गई थी। उनके अंतिम संस्कार वाले दिन ब्रह्मचारी निगमानंद सरस्वती को श्रद्धांजलि देने के लिए पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, काबीना मंत्री यशपाल आर्य समेत कई अन्य नेता और कई स्थानीय संत भी पहुंचे थे। सभी ने सरकार की आलोचना की थी और निगमानंद के संकल्प को पूरा कराने के लिए काम करने का दावा किया था। आज वे सब दावे हवा में उड़ गए। अब केवल निगमानंद की यादें बची हैं। बृहस्पतिवार को बलिदान दिवस के मौके पर न तो कोई संत पहुंचा और न ही जनप्रतिनिधि। जिले में 11 विधायक हैं, लेकिन किसी को निगमानंद की समाधि पर श्रद्धा के दो फूल चढ़ाने की याद नहीं आई। मातृसदन के परमाध्यक्ष स्वामी शिवानंद सरस्वती का कहना है कि गंगा के लिए कोई गंभीर नहीं है तो फिर गंगा के लिए बलिदान देने वालों को कौन गंभीरता से लेगा। उन्होंने कहा कि निगमानंद के बलिदान के बाद अंतिम संस्कार के समय सारी देश का मीडिया आश्रम में मौजूद था इसलिए लोग भी आए थे। अब यह मसला प्रचार का मुद्दा नहीं बन सकता तो कोई नहीं आया इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता हम गंगा के लिए लड़ रहे थे, लड़ रहे हैं और लड़ते रहेंगे। मातृसदन और उनकी विचारधारा वाले लोग निगमानंद के संकल्प को पूरा कराने के लिए संघर्ष करते रहेंगे।
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