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...फिर पास हुई सोमवती, दस सालों से वैशाखी फेल
Updated Mon, 16 Apr 2018 10:48 PM IST
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कौशल सिखौला
हरिद्वार।
सोमवती अमावस्या पर एक बार फिर भारी भीड़ जुटी। वर्ष का सबसे बड़ा स्नान पर्व बैसाखी के बजाए अब सोमवती अमावस्या हो गया है।
बैसाखी मेला प्रतिवर्ष 13 अप्रैल को पड़ता है। सूर्य का मेष राशि में संक्रमण 14 अप्रैल को होने से पुण्यकाल का स्नान अगले दिन होता है। बैसाखी पर मुख्य रूप से पंजाब और हरियाणा के लाखों यात्री गंगा नहाने आते थे। उत्तर प्रदेश के किसानों की संख्या भी काफी होती थी। मान्यता थी कि बैसाखी का गंगा स्नान करने के बाद ही गांव लौटकर फसल में पहली दरांती लगाई जाएगी। अनेक किसान तो अपनी दरांती को भी गंगा में डुबोकर स्नान कराते थे। मान्यता थी कि गंगा मैया में स्नान के बाद कटान से फसल बढ़िया बिकेगी। जबसे फसलों को काटने में मशीनों का प्रयोग होने लगा, तब से बैसाखी में स्नानार्थियों की भीड़ घटने लगी। पिछले दस वर्षों से तो इस मेले पर बहुत कम यात्री गंगा नहाने आते हैं। अलबत्ता कुछ शहरी भागों से वे स्नानार्थी जरूर पहुंचते हैं, लेकिन उनका फसलों से कोई लेना देना नहीं। इसके विपरीत सोमवती अमावस्या पर हमेशा भीड़ड़ उमड़ती रही है। सोमवार के दिन सूर्योदय के समय एक मिनट भी अमावस्या की तिथि पड़ जाए तो पूरे दिन स्नान होता है। विभिन्न राज्यों की महिलाओं से जुड़ा होने से यह स्नान पर्व सौभाग्य पर्व बन चुका है। शास्त्रों में सोमवार के दिन अमावस्या का स्नान करने को कुंभ के समान पुण्यदायी बताया गया है।
हादसों के बाद भी कम नहीं हुई कभी अमावस्या पर भीड़
सोमवती अमावस्या पर भारी भीड़ के उमड़ने पर कई बार परस्पर कुचले जाने से गंभीर दुर्घटनाएं भी हुई। आजादी के बाद 1950 में पड़ी सोमवती पर हरकी पैडी और भीमगोड़ा के बीच में 12 यात्री कुचल कर मर गए थे। वर्ष 1967 में खास हर की पैडी की अपर रोड पर भगदड़ मचने से 17 यात्री कुचले गए। सभी की मौत हो गई। वर्ष 1995 में तो सवेरे पांच बजे ही शताब्दी पुल पर भगदड़ मचने से 22 यात्रा मौके पर कुचले गए। इन घटनाओं के बाद भी किसी सोमवती पर यात्रियों ने स्नान से मुंह नहीं मोड़ा। भले ही पिछली बार की तरह कईं बार अर्द्धकुंभ मेला फेल हो गया हो, पर सामेवती हमेशा पास हुई है।
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