{"_id":"5aa804184f1c1bb8758b5372","slug":"111520960536-haridwar-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"मानसिक गुलामी ही पाश्चात्य ज्ञान विज्ञान को श्रेष्ठ मानने का कारक","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मानसिक गुलामी ही पाश्चात्य ज्ञान विज्ञान को श्रेष्ठ मानने का कारक
Updated Tue, 13 Mar 2018 10:32 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विज्ञापन
अमर उजाला ब्यूरो
हरिद्वार।
भारतीय धरोहर पाठक मंडल की ओर से प्राचीन भारत में विज्ञान एवं तकनीकी विषय पर प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी डा. ओमप्रकाश पांडेय ने कहा कि भारत की समृद्ध विरासत विज्ञान और तकनीकी की निरंतर उपेक्षा की जा रही है। इसका कारण हमारी मानसिक गुलामी है।
उन्होंने कहा कि न्यूटन से 500 वर्ष पहले भाष्कराचार्य ने गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत प्रतिपादित किया था। ईसा से 6000 वर्ष पूर्व कणाद ऋषि ने कण के वैज्ञानिक सिद्धांत को प्रतिपादित कर गुरुत्वाकर्षण का नियम बनाया था। पाश्चात्य विज्ञानी कापरनिकस ने जहां पृथ्वी को गोल बताकर चर्च और पादरियों का विरोध झेला, वहीं हमारे ऋगवेद ने हजारों साल पहले पृथ्वी को चक्र जैसा गोल बताया था। कहा कि ऋग्वेद ने सप्त रंगों का प्रतिपादन किया है तथा शून्य यजुर्वेद की देन है, जिसे आर्यभट्ट प्रयोग में लाए थे। डा. पांडेय ने कहा कि भारत की समृद्ध ज्ञान विज्ञान तकनीक का पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने केवल अंग्रेजी में अनुवाद ही किया है अंकगणित, बीजगणित और ज्यामीतिय भारत से ही अरब होते हुए पाश्चात्य देशों तक पहुंची है और इसके प्रमाण भी है। विमल कुमार ने बताया कि भारत सांस्कृतिक विरासत का संपन्न देश है। यहां ऋषि मुनियों ने वेदों की रचना कर वर्तमान में पाश्चात्य देशों ने विज्ञान के क्षेत्र में जो उपलब्धियां प्राप्त की है उसे आधार प्रदान किया। इस कारण हमें अपनी प्राचीन संस्कृति पर गर्व करना चाहिए।
विज्ञापन
डा. अजय मगन ने बताया कि कॉस्मिक एनर्जी से हेल्थ, वेल्थ और हैप्पीनेस सब हासिल की जा सकती है जो हमारे शरीर में ही समाहित रहती है। पूर्व कुलपति डॉ. महावीर प्रसाद अग्रवाल ने कहा कि भार
विज्ञापन