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दशहरे का सबसे अनूठा मेला है 'गागली युद्घ'
अमर उजाला, साहिया
Updated Sun, 13 Oct 2013 08:18 PM IST
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सदियों पुरानी मान्यता के अनुसार रविवार को उत्तराखंड के विकासनगर क्षेत्र में दशहरे के दिन उद्पाल्टा और कुरोली गांव के लोगों के बीच करीब एक घंटे तक ‘गागली युद्ध’ हुआ।
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इसके बाद एक-दूसरे के गले मिलकर पाइता पर्व की बधाइयां दी गई। सैकड़ों लोगों ने दो सगी बहनों की घासफूस की प्रतिमाओं को कुए में विसर्जित किया।
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कुल देवता बत्तिसर देव की पूजा
सुबह थाती-माठी (गांव का मूल स्थान) और गांव के कुल देवता बत्तिसर देव की पूजा की गई। परंपरा के अनुसार ग्रामीणों ने दो बहनों रानी और मुन्नी की प्रतीक स्वरूप घासफूस की प्रतिमाएं अष्टमी के दिन बर्नाई थी।
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रविवार को दोनों गांवों के लोग ढोल नगाड़ों के साथ क्याणी डांडा पहुंचे यहां प्रतिमाओं को कुए में विसर्जित किया गया। इसके बाद लोगों ने गागली के डंठल एक दूसरे पर फेंके।
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इसे स्थानीय भाषा में हैलरियाटे कहा जाता है। करीब एक घंटे तक चले युद्ध के बाद लोगों ने पाइता पर्व की एक-दूसरे को बधाई दी।
श्राप से मुक्ति का पर्व है पाइता
किवदंतियों के अनुसार रानी और मुन्नी दो बहनें थी। दोनों साथ-साथ कुएं में पानी भरने जाती थी। एक दिन रानी की कुए में गिरने से मौत हो गई। लोगों ने रानी की मौत के लिए मुन्नी को दोषी ठहराया। इससे परेशान होकर मुन्नी ने भी कुए में छलांग लगाकर जान दे दी।
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दोनों बहनों की मौत के श्राप से बचने के लिए लोग महासू देवता की शरण में गए। देवता ने श्राप से बचने के लिए दोनों बहनों की घासफूस की प्रतिमाओं को दशहरा के दिन कुए में विसर्जित करने की बात कही। तबसे उद्पाल्टा में पाइता पर्व मनाने की परंपरा शुरू हो गई।
ग्रामीणों का कहना है कि जब तक गांव में दशहरे के दिन दो कन्याओं का जन्म नहीं हो जाता तब तक यह परंपरा जारी रहेगी ताकि गांव को किसी अनहोनी से बचाया जा सके।