उत्तराखंड के सियासी संकट में पहली बार छुट्टी के दिन खुली अदालत
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
उत्तराखंड में कांग्रेस विधायकों के बागी तेवरों के साथ शुरू हुई राजनैतिक उठापटक के बाद अब सबकी निगाहें हाईकोर्ट के छह अप्रैल के संभावित फैसले पर टिक गई हैं।
सियासी संकट के प्रकरण में पूर्व मुख्यमंत्री, बागी विधायकों सहित विभिन्न पक्षों की ओर से हाईकोर्ट में आठ दिन के भीतर सात याचिकाएं दायर की जा चुकी हैं। खास बात यह है कि इन आठ दिनों में तीन दिन हाईकोर्ट में अवकाश था, फिर भी एक दिन न्यायाधीश ने सुनवाई की।
उत्तराखंड हाईकोर्ट के इतिहास में पहली बार इतने कम दिनों में एक ही प्रकरण पर इतनी याचिकाएं दायर हुईं। इस अवधि में अटॉर्नी जनरल, सॉलिसिटर जनरल, पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री सहित देश के जाने-माने अधिवक्ताओं ने यहां आकर मामले में बहस की।
सबसे पहले 25 मार्च को हाईकोर्ट में आठ बागी विधायकों की ओर से विधानसभा अध्यक्ष द्वारा 19 मार्च को दिए गए शोकॉज नोटिस को चुनौती दी गई। होली के अवकाश के कारण बंद हाईकोर्ट को खुलवाकर न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया ने सुनवाई की।
हालांकि उन्होंने याचिका को प्री मेच्योर मानते हुए खारिज कर दिया। विधायकों की ओर से सुप्रीम कोर्ट से आए वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश द्विवेदी व स्पीकर की ओर से पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री कपिल सिब्बल आदि ने पैरवी की।
वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने की हरीश रावत की पैरवी
उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने पैरवी की। इस प्रकरण पर 29 मार्च को भी सुनवाई जारी रही, जिसके बाद हाईकोर्ट ने अहम फैसला देते हुए विधानसभा में 31 मार्च को शक्ति परीक्षण करने तथा इसमें बागी विधायकों को भी शामिल करने के साथ मतदान का परिणाम सील कवर में हाईकोर्ट में प्रस्तुत करने के निर्देश दिए।
मामले में केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता आदि ने बहस की। इससे पूर्व 28 मार्च को ही बागी विधायकों ने उनकी सदस्यता समाप्त किए जाने के खिलाफ कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसे न्यायमूर्ति यूसी ध्यानी ने सुनवाई के लिए एक अप्रैल के लिए रखा।
इसके बाद 30 मार्च को हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ एवं न्यायमूर्ति वीके बिष्ट की खंडपीठ के समक्ष केंद्र सरकार की ओर से उत्तराखंड विधानसभा में 31 मार्च को मतदान किए जाने संबंधी एकलपीठ के आदेश को चुनौती दी गई, जिस पर लंबी सुनवाई के बाद कोर्ट ने दोनों पक्षों की सहमति से फ्लोर टेस्ट को स्थगित करते हुए 6 अप्रैल को अंतिम सुनवाई के लिए रखा।
मामले में अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी, अभिषेक मनु सिंघवी आदि ने पैरवी की। फिर 31 मार्च को हरीश रावत व अल्मोड़ा के कांग्रेस अध्यक्ष की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर कर यूनियन ऑफ इंडिया, समाचार प्लस चैनल के सीईओ उमेश शर्मा सहित विभिन्न इलेक्ट्रानिक व प्रिंट मीडिया को पार्टी बनाते हुए स्टिंग ऑपरेशन दिखाए जाने पर रोक लगाने की मांग की गई। इसके बाद पहली अप्रैल को हाईकोर्ट में तीन याचिकाएं दायर हुईं।
---------------------
यहां तो रोज होता है रावत और बहुगुणा में मुकाबला
पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के नेतृत्व में कांग्रेस के नौ विधायकों की ओर से बागी तेवर दिखाने के बाद से प्रदेश में राजनैतिक भूचाल आया हुआ है। लेकिन इस प्रकरण से हटकर एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि हाईकोर्ट गेट के ठीक बाहर भोजन के दो ही रेस्टोरेंट हैं, जहां लंच व चाय के लिए हाईकोर्ट के अधिकांश अधिवक्ताओं का जमावड़ा रहता है।
संयोगवश इनमें एक बहुगुणा रेस्टोरेंट तथा दूसरा रावत जलपान गृह है। इन दोनों में रोज ही आपस में मुकाबला रहता है। फर्क सिर्फ इतना है कि जहां सत्ता के लिए रावत व बहुगुणा के बीच जबरदस्त जंग में प्रदेश की जनता पिस रही है, वहीं रेस्टोरेंट के मामले में नंदन सिंह रावत, रमेश रावत तथा विनोद बहुगुणा के बीच अधिवक्ताओं को बेहतर भोजन व सुविधा देने की होड़ रहती है।
ये है मुख्य मांग
हाईकोर्ट में दलीलें और मुख्य मांगें
1. हमे बहुमत सिद्ध करने दिया जाए - हरीश रावत
2. हमारी सदस्यता समाप्त न हो- बागी विधायक
3. अल्पमत में आई थी रावत सरकार, राज्य में राष्ट्रपति शासन उचित- केंद्र सरकार
4. स्टिंग ऑपरेशन दिखाने पर लगे रोक- हरीश रावत
5. स्टिंग के आधार पर पूर्व सीएम हरीश रावत की सीबीआई हो जांच- मनन शर्मा दूसरा याचिकाकर्ता
6. विधानसभा से पारित मनी बिल में केंद्र न करें हस्तक्षेप- हरीश रावत, इंदिरा हृदयेश
7. 11 अप्रैल तक वक्त दिया जाए- बागी विधायक
8. फ्लोर टेस्ट को 6 अप्रैल तक टाला जाए - संयुक्त रूप से केंद्र तथा हरीश रावत