देश के लिए मिसाल हैं देवभूमि की किन्नर मौसी
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
लोग यूं तो किन्नर को जन्मोत्सव, शादी और अन्य शुभ अवसरों पर नाचने-गाने वाली के रूप में जानते हैं, लेकिन हल्द्वानी के उजाला नगर में रहने वाली कजरी की सोच औरों से जुदा है।
वह खुद तो अनपढ़ हैं, पर गरीब बच्चों को शिक्षा के लिए प्रेरित कर उनके जीवन में उजाला फैलाने की कोशिश कर रही हैं। सदैव स्नेह दिखाने के कारण ही बच्चे उन्हें प्यार से मौसी कहते हैं, तो बड़े दीदी।
बच्चों का पढ़ाने का शौक रखने वाली कजरी अब तक 13 से ज्यादा गरीब बच्चों को शिक्षा दिलाने में मदद कर चुकी हैं। यही नहीं, बीते माह कजरी ने नगर में बन रहे एक पुस्तकालय में भी एक लाख की सहयोग राशि देकर शिक्षा के प्रति अपनी जीवटता दिखाई है।
उसका यही गुण उसे किन्नर होने के बाद भी सामान्य लोगों की श्रेणी से ऊपर खड़ा कर देता है। कजरी के जीवन का यह पक्ष शायद कम ही लोग जानते हैं।
हर बच्चे को शिक्षित देखना चाहती हैं मौसी
घर-परिवार में होने वाले मंगल कार्यों में नाच-गाकर बधाई व आशीर्वाद देने वाली कजरी को बच्चों से इस कदर लगाव है कि वह समाज के हर बच्चे को शिक्षित देखना चाहती है। इसके लिए कजरी ने समाज के गरीब बच्चों को शिक्षित करने का बीड़ा भी उठाया है।
अपना कामकाज करने के बाद कजरी अक्सर नगर व आसपास के प्राथमिक विद्यालयों व आंगनबाड़ी केंद्रों में पहुंच जाती हैं और गरीब बच्चों को पढ़ाई में सहायता के लिए आर्थिक मदद करती हैं। कजरी कहती हैं कि बच्चों के जन्म पर वह बधाई लेकर अपना जीवनयापन करती है और जरूरतमंद बच्चों को ड्रेस, किताब-कॉपी देकर उनकी शिक्षा में मदद करती है।
इससे उसे बड़ा शकुन मिलता है। उनका कहना है कि किन्नरों के लिए न कोई रोजगार की व्यवस्था है न ही परिवार जैसी कोई इकाई होती है फिर भी वे आरक्षण की मांग नहीं करती। ऐसे में शारीरिक व सामाजिक रूप से सक्षम होने के बाद भी कुछ लोगों का आरक्षण की मांग करना हास्यास्पद लगता है।
बच्चों के साथ ही समाज के असहाय लोगों की मदद करने वाली कजरी ग्रामीण क्षेत्रों की रामलीला में भी पिछले कई वर्षों से अंशदान कर रही है। इसे ही वह अपने जीवन की सबसे बड़ी पूंजी मानती है।