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आपदा से टूटे पहाड़वासी मैदान में पलायन को बेबस

Mon, 08 Jul 2013 04:35 PM IST
गुप्तकाशी/आशा प्रसाद सेमवाल
गुप्तकाशी/आशा प्रसाद सेमवाल Updated Mon, 08 Jul 2013 04:35 PM IST
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disaster drain into the ground unassisted breakaway Phadhwasi

केदारघाटी में आपदा के बाद से जहां हजारों श्रद्धालुओं को असमय ही काल का ग्रास होना पड़ा। वहीं इस घटना ने पूरी घाटी के जनमानस को बुरी तरह से झकझोर कर रख दिया है।

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केदारघाटी मार्गो से जुड़े जो गांव आज तक पलायन से अछूते थे, वही अब पलायन करने की सोच रहे हैं। हर साल आने वाली आपदा से लोगों का अपनी मातृभूमि से मोह उठने लगा है। बार-बार आपदाओं के आने से अब यहां के लोगों की विश्वास की नींव भी हिल गई है।
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बीते साल ऊखमठ में मची थी तबाही
बीते वर्ष ऊखीमठ क्षेत्र और इस वर्ष केदारघाटी की घटना के बाद से लोग अब मैदानी क्षेत्रों में बसने की योजना बनाने लगे हैं।पूर्व प्राचार्य सदानंद तिनसोला बताते हैं कि हाल में ही गुप्तकाशी में आवासीय मकान बनाने के लिए गांव छोड़ा था। लेकिन आपदा के बाद से मन नहीं हो रहा कि यहां मकान बनाया जाए।
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पढ़ें: उत्तराखंड आपदा की पल-पल अपडेट

इन दिनों परिवार देहरादून में किराए के भवन पर रह रहा है। वहीं युवा शिक्षक प्रदीप भी कुछ माह पूर्व ही यहां आवासीय मकान के लिए जमीन तलाश रहे थे। जमीन मिल भी गई थी। लेकिन इस घटना के बाद से वे भी देहरादून को ही सुरक्षित मान रहे हैं।

आपदा से बेहद डर गए हैं पहाड़वासी
यह सिर्फ उदाहरण मात्र है। बीते जून में आई आपदा के बाद से असुरक्षा की भावना अन्य कई लोगों के दिलों में भी घर कर चुकी है। यही नहीं स्थानीय जनजीवन पर भी इस घटना की गहरी छाप देखने को मिल रही है। वहीं दूसरी ओर आपदा के बाद से आपदा राहत सामग्री के वितरण ने भी गांव के आदमी को भी मारामारी करते देखा जा रहा है।


आपदाएं पहाड़ में पहले भी आई हैं। इस दुख की घड़ी में समाज आपसी प्रेम और सौहार्द के साथ खड़ा भी हुआ है। लेकिन अब सरकारी राहत पर निर्भरता ने यहां के समाज के आकर्षण को भी कई मील पीछे धकेल दिया है।

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