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आपदा के बाद ऐसे बसाएं ‘आशियाना’

Thu, 18 Jul 2013 08:41 AM IST
विनोद मुसान
विनोद मुसान Updated Thu, 18 Jul 2013 08:41 AM IST
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destruction in uttarakhand

आपदा से उच्च हिमालयी क्षेत्र के जिस हिस्से में सबसे अधिक नुकसान हुआ है, वहां परिस्थितियां विपरीत हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि पुनर्निर्माण भविष्य में आने वाली हर छोटी-बड़ी आपदा और उसकी तीव्रता को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए। जिसमें तकनीक का बेहतर इस्तेमाल हो।

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जिस हिमालय क्षेत्र में यह प्रदेश खड़ा है, उसकी आयु डेढ़ सौ से दो सौ करोड़ वर्ष के बीच आंकी गई है। वावजूद इसके इसे नवनिर्मित की श्रेणी में रखा गया है। प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से बेहद संवेदनशील इस बेल्ट (हिमाचल से लेकर नेपाल तक) में हर थोड़ी दूरी पर चट्टान का आकार-प्रकार और उसका संयोजन (कंपोजिशन) बदल जाता है। अधिकतर चट्टानें फाइलाइट, सेल्ट और शैल की बनी हैं, जो सबसे कमजोर श्रेणी की रॉक्स हैं।
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हर डिविजन में अलग संरचना
डीबीएस (पीजी) कालेज के भूगर्भ विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष डा. एके बियानी बताते हैं कि हिमालयन बेल्ट में हर थोड़ी दूरी पर चट्टानों की संरचना में कई प्रकार के बदलाव देखने को मिलते हैं। उत्तराखंड में इसे चार डिविजन में बांटा गया है। जिसे हम बहारी हिमालय, लघु हिमालय, उच्च हिमालय और टेथिस हिमालय के नाम से जानते हैं। हर डिविजन में अलग संरचना देखने को मिलती है।

16-17 जून की बारिश केबाद सबसे ज्यादा नुकसान उच्च हिमालय क्षेत्र में हुआ है। अब अगर पुनर्निर्माण की बात करते हैं तो इसके लिए तमाम वैज्ञानिक पहलुओं पर विचार करना होगा। हिमालयन क्षेत्र में होने वाले किसी भी निर्माण से पहले क्षेत्र विशेष का भू-वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है। जिसमें क्षेत्र में सक्रिय फाल्ट (भ्रंश), ज्वाइंट (संधि), स्पेस (दो ज्वाइंट के बीच की दूरी) और स्लोप (ढलान) का प्रकार विशेष महत्व रखता है। जिन्हें हिमालय क्षेत्र में किए जाने वाले किसी भी निमार्ण केदौरान नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। खासकर सड़कें, पुल और बड़े निर्माण से पूर्व इन बातों का अध्ययन बेहद जरूरी है।

महत्वपूर्ण बिंदु
- हिमालय क्षेत्र में निर्माण पूर्व हर छोटी-बड़ी आपदा के पहलुओं पर विचार किया जाना जरूरी है।
- सड़कों के निर्माण के दौरान संवेदनशील क्षेत्रों में वैकल्पिक मार्ग की व्यवस्था पर पहले से विचार किया जाए। यह सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
- नदी-नालों से बनाए रखें एक निश्चित दूरी। पूर्व में लोग इन बातों का अनुसरण करते हुए हमेशा अपने आशियाने नदियों से दून ऊपरी क्षेत्र में बनाते थे।
- निर्माण से पूर्व भू-वैज्ञानिक अध्ययन केसाथ आर्किटेक्ट की रिपोर्ट भी विशेष महत्व रखती है। हर निर्माण, क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति के हिसाब से अलग-अलग मेटेरीयल की मांग करता है।
- निर्माण के दौरान आपदा (भूकंप, बाढ़, भूस्खलन) की अधिकतम तीव्रता का ध्यान भी रखा जाना चाहिए।

नदियों ने नहीं बदली अपनी दिशा
प्रदेश में आई आपदा के बाद कहा जा रहा है कि तेज जलप्रवाह के बाद अलकनंदा, मंदाकनी, भागीरथी सहित अन्य सहायक नदियों ने कई स्थानों पर अपनी दिशा बदल दी है। जबकि हकीकत में ऐसा नहीं है। वज्ञानिकों की मानें तो यह नदियों की स्वभाविक प्रवृत्ति है। उसे जिसे दिशा में ढाल मिलती है, वह वहीं बहने लगती है।


नदियां लोगों के रास्ते में नहीं आती हैं, बल्कि लोग नदियों के रास्ते में आ जाते हैं। केदानाथ प्रलय के बाद यह साफ हो गया है कि नुकसान वहीं अधिक हुआ है, जहां लोगों ने नदी की सीमा में अतिक्रमण कर निर्माण किया था।

भूस्खलन नहीं डेवरिस प्रवाह था
केदारनाथ में जलप्रलय के बाद घाटी में करीब 6-7 लाख घन मीटर मलबा जमा हुआ है। कुछ लोग इसे भूस्खलन कह रहे हैं। लेकिन वैज्ञानिक भाषा में इसे डेवरिस प्रवाह या मड प्रवाह कहा जाता है। जो पानी के साथ भारी मात्रा में अपने साथ मिट्टी और पत्थरों का बहा ले जाता है।

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