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जाग-जाग मचि रै बैठकी होलीकि धूम
सतीश जोशी ‘सत्तू’ /अमर उजाला, चंपावत
Updated Wed, 01 Mar 2017 09:59 PM IST
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जाग-जाग मचि रै बैठकी होलीकि धूम
- फोटो : अमर उजाला
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काली कुमूंक नामेले प्रसिद्ध चंपावत जिल में इन दिनों जाग-जाग बैठकी होलीकि धूम मचि रै। पूसक महीनाक पैल ऐतवार बठि जिलक पहाड़ी इलाक में बैठकी होली का गायन शुरू है जां छ, जू ठाड़ी होलीक खत्म हुन तक जारी रूंछ।
काली कुमूंक इलाक में जां ठाड़ी होलीक गायन भौत लोकप्रिय भय, वांई यांक धार्मिक स्थानोंक अलावा गौं घरों में गाई जान्या बैठकी होलीक लै खास मान्यता भै। इन दिनों गौं घरों में रात भरि बैठकी होलीकि महफिल सजनैछीन। चंपावत में चंद और कत्यूरी राजाओंक जमान में चौबे होली गाई जांछि। तहसील परिसर में राजाबुंगाक किल में चौबे होली गाई जांछि, लेकिन आब चौबे होली गानेकि परंपरा बुसी गै।
काली कुमूं कि चंपावत कै अल्मोड़क बाद दोसरी सांस्कृतिक नगरी मानी जांछि। यांकि ठाड़ि होली साथ बैठकी होलीक लै कोई जवाब न्या भै। यांकि राग और फागों में डूबिनाकि बैठकी होली जू एक बैर सुण लिछ उ मदहोश है जांछ।
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पूसक महीनाक पैल ऐतवार बठि शुरू हुन्य बैठकी होलीक गायन में टैम और रागोंक खास ध्यान राखि जान्य भै। बैठकी होलीकि शुरूआत राग जंगला काफी बठि हुन्य भै तक होलीक समापन राग भैरवी में हुन्य भै। काली कुमूं में गाई जान्या बैठकी होलीकि एक खास बात यो भै कि एक संग पचास बठि सौ तक आदमी मिल बैर गैन्य भै। सब्बौक गलों बठि एक संगै निकलन्य स्वर लोगोकै आपणी तरफ आकर्षित करछ। पहाड़ी इलाक में बैठकी होली मंदिरों, सार्वजनिक खलो और गौं घरों में गाई जांछि। जै मै गौंक सब्बे लोग भाग लिन्य भै।
कई लोग लागि रई बैठकी होलीक संरक्षण में
चंपावत। जिल में बैठकी होली गायन की परंपरा ज्यून राखनै थे कई लोग और संगठन लागि रई। होली गायन लोककलाओंक संरक्षण में जुटिनांक राजेंद्र गहतोड़ी ज्यूक कूंण छ कि सबै लोगोंक प्रयास बठि सांस्कृतिक विरासत खन बचाई जा सकी।
मानेश्वर मंदिर में एकदशी बठि होल ठाड़ि होलीक गायन
पहाड़ में बैठकी होलीक संगै ठाड़ि होलीक गायन लगै बहुत महत्वपूर्ण भै। मानेश्वर मंदिर में फागुन महिनकि एकदशी दिन लाग्यन्या म्यल बठि ठाड़ि होलीक गायन शुरू हैं जां छ। ए बार मानेश्वर मंदिर में आठ फरवरी खन एकदशीक म्यल लागलौ।
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काली कुमूंक इलाक में जां ठाड़ी होलीक गायन भौत लोकप्रिय भय, वांई यांक धार्मिक स्थानोंक अलावा गौं घरों में गाई जान्या बैठकी होलीक लै खास मान्यता भै। इन दिनों गौं घरों में रात भरि बैठकी होलीकि महफिल सजनैछीन। चंपावत में चंद और कत्यूरी राजाओंक जमान में चौबे होली गाई जांछि। तहसील परिसर में राजाबुंगाक किल में चौबे होली गाई जांछि, लेकिन आब चौबे होली गानेकि परंपरा बुसी गै।
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काली कुमूं कि चंपावत कै अल्मोड़क बाद दोसरी सांस्कृतिक नगरी मानी जांछि। यांकि ठाड़ि होली साथ बैठकी होलीक लै कोई जवाब न्या भै। यांकि राग और फागों में डूबिनाकि बैठकी होली जू एक बैर सुण लिछ उ मदहोश है जांछ।
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पूसक महीनाक पैल ऐतवार बठि शुरू हुन्य बैठकी होलीक गायन में टैम और रागोंक खास ध्यान राखि जान्य भै। बैठकी होलीकि शुरूआत राग जंगला काफी बठि हुन्य भै तक होलीक समापन राग भैरवी में हुन्य भै। काली कुमूं में गाई जान्या बैठकी होलीकि एक खास बात यो भै कि एक संग पचास बठि सौ तक आदमी मिल बैर गैन्य भै। सब्बौक गलों बठि एक संगै निकलन्य स्वर लोगोकै आपणी तरफ आकर्षित करछ। पहाड़ी इलाक में बैठकी होली मंदिरों, सार्वजनिक खलो और गौं घरों में गाई जांछि। जै मै गौंक सब्बे लोग भाग लिन्य भै।
कई लोग लागि रई बैठकी होलीक संरक्षण में
चंपावत। जिल में बैठकी होली गायन की परंपरा ज्यून राखनै थे कई लोग और संगठन लागि रई। होली गायन लोककलाओंक संरक्षण में जुटिनांक राजेंद्र गहतोड़ी ज्यूक कूंण छ कि सबै लोगोंक प्रयास बठि सांस्कृतिक विरासत खन बचाई जा सकी।
मानेश्वर मंदिर में एकदशी बठि होल ठाड़ि होलीक गायन
पहाड़ में बैठकी होलीक संगै ठाड़ि होलीक गायन लगै बहुत महत्वपूर्ण भै। मानेश्वर मंदिर में फागुन महिनकि एकदशी दिन लाग्यन्या म्यल बठि ठाड़ि होलीक गायन शुरू हैं जां छ। ए बार मानेश्वर मंदिर में आठ फरवरी खन एकदशीक म्यल लागलौ।