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Hindi News ›   Uttarakhand ›   Champawat News ›   The trauma center Trauma itself become!

खुद ट्रॉमा बन गए ये ट्रॉमा सेंटर!

Fri, 16 Oct 2015 10:50 PM IST
चंद्रशेखर जोशी/अमर उजाला, चंपावत
चंद्रशेखर जोशी/अमर उजाला, चंपावत Updated Fri, 16 Oct 2015 10:50 PM IST
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नाम ट्रॉमा सेंटर (आधुनिक सुविधायुक्त आपात चिकित्सा केंद्र), काम इमरजेंसी में इलाज कर जिंदगी बचाना पर इस जिले के ट्रॉमा सेंटर अपने नाम के अनुरूप काम नहीं कर रहे हैं। सेंटर को स्वास्थ्य विभाग को हस्तांतरित किए जाने के बावजूद इनका उपयोग नहीं हो पा रहा है। फिलहाल ये केंद्र धन की बर्बादी नजर आ रहे हैं।

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कभी-कभी दवा खुद बीमारी का कारण बन जाती है। कमोबेश ऐसे ही हाल टनकपुर और लोहाघाट में स्थापित दो ट्रॉमा सेंटरों के हैं। 2.02 करोड़ रुपये की लागत से ये केंद्र तो बन गए मगर उपयोग लायक नहीं बन सके। भवन बनने के बाद इनका इस्तेमाल कैसे और कब तक हो सकेगा? इस सवाल का जवाब न विभाग के पास है और न जनप्रतिनिधियों के पास। ट्रामा सेंटरों का उपयोग नहीं होने की वजह उपकरण से लेकर डॉक्टर और अन्य पदों का सृजन नहीं होना है। ट्रॉमा सेंटर में सर्जन, निश्चेतक, न्यूरो सर्जन सहित डॉक्टरों के छह पद और इतने ही पैरा मेडिकल स्टाफ के पद होने चाहिए।
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जिले के दोनों ट्रॉमा सेंटरों के भवन बनकर तैयार हो चुके हैं और कार्यदायी संस्था ने सितंबर में इन भवनों को विभाग को हस्तांतरित भी कर दिए हैं, लेकिन अभी डॉक्टर और अन्य पदों का सृजन नहीं हो सका है। पदों को सृजित करने के लिए लिखा गया है। उपकरण और डॉक्टरों की तैनाती होने के बाद ही टॉमा सेंटर शुरू हो सकेगा। -डा.विनोद टोलिया, सीएमओ
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ट्रॉमा सेंटरों के उपयोग के लिए सरकार प्रयास कर रही है। टनकपुर में डॉक्टर और अन्य पद सृजित हैं, लेकिन प्रदेशभर में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है, जिस कारण ट्रॉमा सेंटर संचालित नहीं हो पा रहे हैं। स्वास्थ्य मंत्री से बात कर यहां के लिए पदों का सृजन जल्द से जल्द करा इसे शुरू कराया जाएगा। -हेमेश खर्कवाल, विधायक, चंपावत।


फिलहाल रेफर हो रहे हैं ज्यादातर केस

चंपावत जिले में इमरजेंसी तो छोड़िए सामान्य इलाज की भी ठीकठाक व्यवस्था नहीं है। ऐसे में ये ट्रॉमा सेंटर बेहद लाभदायक होते। इस वक्त गर्भवती महिलाओं, रोड दुर्घटनाओं, भूस्खलन, अतिवृष्टि, आपदा और अन्य मौकों पर पीड़ितों को जिले से बाहर करीब 200 किमी दूर हल्द्वानी, बरेली अथवा दूसरे उच्च केंद्रों में दौड़ लगानी पड़ रही है, जिसमें न केवल असुविधा और भारी धन खर्च होता है, बल्कि मरीज की जिंदगी के लिए भी खतरे की आशंका रहती है। वक्त पर इलाज नहीं मिलने से हर साल काफी लोगों की मौतें भी हो रही हैं।

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