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रहस्य को समेटे है ताम्रपेटी में सहेजी मां बाराही की मूर्ति

Mon, 07 Aug 2017 11:05 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो चंपावत
अमर उजाला ब्यूरो चंपावत Updated Mon, 07 Aug 2017 11:05 PM IST
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The mystery of the son of Barabhi, saved in Tamrapheti
ताम्र पेटिका में ढंकी मां बाराही देवी की मूर्ति। - फोटो : Statue of Barahi Goddess covered in Tamar Petika
 इस नए दौर में पाषाण काल की याद दिलाने वाला बग्वाल मेला सचमुच विलक्षण है। पाषाणकालीन पत्थर युद्ध की परंपरा (बग्वाल) वाला यह मेला कई रहस्य भी समेटे हुए है। मां बाराही देवी की मूर्ति और भीमशिला का रहस्य भी विलक्षण है। मंदिर के गर्भगृह में ताम्रपेटिका में रखी मां बाराही की मूर्ति को खुली आंखों से देखने की परंपरा नहीं है। आज तक मां ब्रज बाराही की मूर्ति को किसी भी श्रद्धालु ने नहीं देखा है। केवल पुजारी की ओर से ही आंखों में पट्टी बांध कर मूर्ति को स्नान कराने की परिपाटी सदियों से चली आ रही है। मंगलवार को ताम्रपेटिका में रखी मूर्ति को पुजारी धन सिंह बांगड़ आंखों में पट्टी बांधकर स्नान कराएंगे।
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मुख्य मंदिर में तांबे की पेटी में रखी मूर्ति के दर्शन अभी तक किसी के द्वारा नहीं किए जाने से यह भी स्पष्ट नहीं है कि यह मूर्ति किस धातु की बनी है। इस संबंध में यहां दो किंवदंतियां हैं। कहा जाता है कि चूंकि मां दिगंबरा शक्ति है, ऐसे में भक्त का मां को वस्त्रहीन रूप में देखना धर्म और नीति विरुद्ध है। दूसरी किंवदंती के अनुसार कभी यह मूर्ति चोरी हो गई थी। मूर्ति चुरा कर ले जाने वाले व्यक्ति की नेत्र ज्योति चली गई थी, तब इस व्यक्ति ने देवी मूर्ति को वापस मंदिर में रख दिया था।
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मंदिर के प्रवेश द्वार से कुछ आगे एक चक्का है, जिसे मध्यकाल का बताया जाता है। यहां से करीब 25 गज की दूरी पर भीमशिला है। इस शिला के साथ पांडवों के वनवास से लेकर बौद्धों के हीनयान और महायान तथा सनातन धर्म के प्रचारक शंकराचार्य तक की कथाएं जुड़ी हैं। यह विशाल शिलाखंड दो हिस्सों में इस तरह से बंटा है, जैसे किसी ने आरी से काटा हो। मंदिर के निकट ही मुचकंद ऋषि का आश्रम है जिसे मचवाल मंदिर कहा जाता है। ऋषि की भक्ति से प्रसन्न मां बाराही देवासुर संग्राम में विजय के पश्चात स्वयं वहां दर्शन देने गई थी। ये परिपाटी अब भी जीवित है। बग्वाल निपटने के बाद अब अगले दिन मंगलवार को मुख्य मंदिर से मचवाल मंदिर तक बाराही देवी की शोभायात्रा निकलेगी।
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मेरी माता बाराही जब बोलली तब हम उना...
हल्द्वानी से आए लोक कलाकारों ने जमाया रंग

देवीधुरा (चंपावत)। बग्वाल मेले में आयोजित सांस्कृतिक संध्या में हल्द्वानी से आए लोक कलाकारों ने बेहतरीन प्रस्तुतियों से दर्शकों का खूब मनमोहा। कलाकारों ने सबसे पहले मां बाराही की आराधना करते हुए जै मां बाराही तू दैंड़ां है जाए... की प्रस्तुति दी। उसके बाद मेरी माता बाराही जब बोलली तब हम उना... बोल पर झोड़ा पेश किया। मोहन पांडेय के नेतृत्व में हल्द्वानी से आई आंचल कला केंद्र की टीम ने गढ़वाली लोक नृत्य पेश किए। अल्मोड़ा से आई पूरन सिंह के नेतृत्व में आई टीम ने उम्दा छलिया नृत्य पेश किया। झोड़े के जरिए की मां की स्तुति भी की गई। झोड़ा खेलने के लिए अल्मोड़ा, बागेश्वर, नैनीताल जिले से बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। विभिन्न जिलों से आए कलाकारों ने झोड़ा चांचरी गायन के जरिए मां बाराही देवी का स्तुतिगान किया।
 
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