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तो एक-चौथाई गैस उपभोक्ता दे रहे सरचार्ज

Sun, 24 Dec 2017 10:47 PM IST
अमर उजाला ब्यूूूूराे चंपावत
अमर उजाला ब्यूूूूराे चंपावत Updated Sun, 24 Dec 2017 10:47 PM IST
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So one-fourth gas consumer surcharge
सूखीढांग में शो पीस बना गैस गोदाम। - फोटो : अमर उजाला
उत्तराखंड राज्य बनने के बाद चंपावत जिले में रसोई गैस के उपभोक्ताओं की संख्या में करीब तीन गुना बढ़ोत्तरी हुई है, लेकिन गैस वितरण केंद्रों की संख्या में इजाफा नहीं हुआ है। इसके चलते अधिकांश दूरदराज के ग्रामीण उपभोक्ताओं को गैस सिलेंडर की रिफिलिंग के लिए 100 से 250 रुपये तक अतिरिक्त मार पड़ रही है। उन्हें गैस की रिफिलिंग के लिए 30 से 75 किमी दूर जाना पड़ रहा है। 
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चंपावत जिले में इस समय 50110 रसोई गैस उपभोक्ता हैं।  राज्य बनने के वक्त ये संख्या करीब 17000 थी। उपभोक्ताओं की संख्या में तेजी से इजाफे के बावजूद रिफिलिंग की सुविधा देवीधुरा को छोड़कर सिर्फ शहरी क्षेत्र में ही सुलभ है। जिले में चार वितरण केंद्र नगरीय क्षेत्र चंपावत, लोहाघाट व टनकपुर तथा एक केंद्र देवीधुरा में है। इन केंद्रों की पहुंच जिले के करीब 70 प्रतिशत उपभोक्ताओं तक ही है। गैस केंद्र की दूरी के चलते नेपाल सीमा से लगे तल्लादेेश, गुमदेश, लधिया घाटी, तल्लापाल, बाराकोट विकासखंड आदि के ग्रामीण क्षेत्रों को सिलेंडर की रिफिलिंग के लिए करीब 30 किमी से लेकर 75 किमी तक जाना होता है। 
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उपभोक्ता विपिन चंद्र जोशी, महा सिंह, शेर सिंह, हेम टिटगई आदि ग्रामीणों का कहना है कि गैस वितरण केंद्रों की दूरी के चलते उन्हें 100 से 250 रुपये भाड़े के रूप में अतिरिक्त खर्च करने पड़ते हैं। साथ ही पूरा एक दिन का समय रिफिलिंग कराने में लग जाता है। 
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गैस वितरण केंद्र के प्रभारी प्रदीप कार्की का कहना है कि तल्लादेश, बाराकोट, रीठा साहिब सहित कई हिस्सों में माह में एक निर्धारित अवधि को गैस की गाड़ी भेजी जाती है। अलबत्ता होम डिलीवरी की सुविधा नहीं होने से हर इलाके तक सिलेंडर भेजना संभव नहीं है। वहीं ग्रामीण उपभोक्ताओं का कहना है कि पहले तो निर्धारित तिथि को गैस सिलेंडर की गाड़ी कम ही पहुंचती है। सिलेंडर की जरूरत तथा वाहन की तिथि भी अक्सर मेल नहीं खाती। ऐसे में रिफिलिंग के लिए सिलेंडर को वितरण केंद्रों में लाना उनकी मजबूरी रहती है। 

कभी नहीं हुआ इन गैस केंद्रों का उपयोग
रसोई गैस सिलेंडर के ग्रामीण क्षेत्रों में बने चार वितरण केंद्र कभी भी उपयोग में नहीं आए। करीब 16 वर्ष पूर्व 10 लाख रुपये से अधिक लागत से निर्मित ये केंद्र अब जर्जर हाल में है। श्यामलाताल, तामली, मौनपोखरी और रौसाल में बने ये गैस गोदाम अब खंडहर में तब्दील हो गए हैं। अब कोई भी भवन इस लायक नहीं रह गए हैं, कि इनका उपयोग हो सके। इन इलाकों के लोग भी रिफिलिंग के लिए शहरों में आने को मजबूर हैं।


काेट
चंपावत जिले के उक्त गैस गोदाम सुरक्षा मानकों को पूरा नहीं करते हैं। किसी भी गैस गोदाम के संचालन के लिए इंडियन ऑयल कंपनी के मानकों का पूरा किया जाना जरूरी है। मानकों को पूरा किए जाने पर ही आईओसी की मंजूरी मिलती है। यह चार गोदाम मानकों पर खरे नहीं उतरते हैं। इन्हीं वजहों से इन गोदामों का उपयोग नहीं हो सका।
टीएस मर्तोलिया,
महाप्रबंधक, केएमवीएन (गैस)।
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