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बकाया पगार देना तो दूर, होटल मालिक ने फोन तक नहीं उठाया, घर से रुपये मांगकर गाजियाबाद से लौटे

Amarujala Local Bureau अमर उजाला लोकल ब्यूरो
Updated Mon, 18 May 2020 04:22 PM IST
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Reach village by getting money from home
मुकेश भंडारी। - फोटो : AMAR UJALA
चंद्रशेखर जोशी, चंपावत। हम अपने गांव पहुंचे हैं, अभी घर में दस्तक देना बाकी है, मगर ऐसा लग रहा है कि हमने कोई जंग जीत ली है। गाजियाबाद में जो कड़ुवे अनुभव रहे, उन्हेंसे याद कर सिहरन होती है। घर पहुंचने के लिए भी घर से रुपये मंगवाने पड़े। अगर हमें आधी रकम में अपने क्षेत्र में काम मिला तो दोबारा दूसरे प्रदेश जाने की भूल नहीं करेंगे। ये व्यथा है गाजियाबाद में काम कर चुके बाराकोट ब्लाक की बाराकोट ग्राम पंचायत के विजय अधिकारी, चंदन अधिकारी, प्रियांशु अधिकारी और मिर्तोली ग्राम पंचायत के मुकेश भंडारी ने। लॉकडाउन से एक दिन पूर्व 21 मार्च तक गाजियाबाद के एक होटल में काम करते रहे ये चारों युवा इस वक्त बाराकोट जीआईसी के क्वारंटीन सेंटर में हैं। कहते हैं कि 22 मार्च से 22 मई तक के 52 दिन वे शायद ही कभी भूल सकेंगे। सब्जी व किराने के सामान के दाम भी सामान्य वक्त की अपेक्षा काफी ज्यादा होने से उनके लिए काफी मुश्किलें हुईं। होटल मालिक ने काम बंद होने के दौरान की पगार तो दूर, 21 मार्च तक का वेतन भी नहीं दिया। उन्हें दो हजार-दो हजार रुपये देकर टरका दिया। आश्वासन दिया था कि बकाया रकम बाद में देंगे। मगर रुपयों की जरूरत होने पर जब फोन किया, तो मालिक ने फोन उठाना भी बंद कर दिया। 5400 रुपये महीने किराये के जिस मकान में रहते थे, उस मकान मालिक ने मई के 11 दिन तक का किराया अदा न कर पाने पर न केवल आने से रोकने की कोशिश की, बल्कि उनका गैस सिलेंडर, बिस्तर, चारपाई सहित कई सामान जब्त कर लिया।
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विजय अधिकारी बताते हैं कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस अपील, जिसमें मकान मालिकों से लॉकडाउन के दौरान किराया माफ करने की गुजारिश की गई थी, की दलील देते हुए रहम खाने की प्रार्थना की, तो मकान मालिक भड़क गया। युवक कहते हैं कि गाजियाबाद प्रशासन या जन प्रतिनिधियों के स्तर से किसी तरह की मदद भी नहीं मिली। रुपये खत्म होने पर उन्होंने अपने-अपने घरों से रकम मंगवाई। चारों युवक बताते हैं कि इस दौरान उन्होंने कुल 13 हजार रुपये मंगवाए। कुछ रुपये लॉकडाउन में भोजन व दूसरे प्रबंध में खर्च हुए और कुछ रुपये आने में लग गए। कहते हैं कि क्वारंटीन अवधि पूरी होने के बाद अब गांव को कर्मभूमि बनाएंगे।
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-:: पैदल चले तो कहीं ट्रक में किया सफर ::: इन रास्तों से पहुंचे अपने गांव बाराकोट ब्लाक के इन चार युवाओं को अपने गांव पहुंचना भी टेड़ी खीर रहा। गाजियाबाद से डासन गेट तक का करीब सात किमी का फासला पैदल गांव तक तय किया। डासन गेट से रामपुर तक ट्रक के जरिए, फिर रामपुर से बाजपुर सीमा तक आए। यहां तक पहुंचने में कुल 7700 रुपये खर्च हुए। बाजपुर सीमा पर एक दरोगा की मदद से बनबसा जगबुड़ा तक पहुंचे। बनबसा से लोहाघाट में स्क्रीनिंग के बाद बाराकोट जीआईसी में क्वारंटीन किए गए।
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Reach village by getting money from home
विजय अधिकारी। - फोटो : AMAR UJALA
विजय अधिकारी।

Reach village by getting money from home
प्रियांशु अधिकारी। - फोटो : AMAR UJALA
प्रियांशु अधिकारी।

Reach village by getting money from home
चंदन अधिकारी। - फोटो : AMAR UJALA
चंदन अधिकारी।
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