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दो सालों से नाशपाती उत्पादकों पर भारी पड़ी कोरोना महामारी
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चंपावत जिले में खरीददार नहीं मिलने से काश्तकार के पेड़ में सडने के कगार पर पहुंची नाशपाती।
- फोटो : CHAMPAWAT
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(सतीश जोशी सत्तू)
चंपावत। कोरोना के कारण दो साल से जिले के नाशपाती उत्पादकों को करारी चपत लगी है। जिले में 350 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल में उत्पादित नाशपाती की विभिन्न प्रजातियों को लगातार दूसरे वर्ष भी खरीदार नहीं मिल पाए। इस कारण अधिकतर फल उत्पादकों की नाशपाती पेड़ों में ही सड़ने से आर्थिक नुकसान हो गया है। स्थानीय स्तर पर फल प्रसंस्करण उद्योगों की कमी के कारण फल उत्पादकों को भी काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
पर्वतीय क्षेत्र में गोल, ककड़िया, तुमड़िया, जाकलिन आदि प्रजातियों की नाशपाती का उत्पादन होता है लेकिन इसके लिए विपणन की कोई सरकारी व्यवस्था न होने से उत्पादकों को परेशानी हो रही है।
नाशपाती उत्पादक दिनेश चंद्र पांडेय, हरीश चंद्र, त्रिलोचन आदि को दो साल से नाशपाती के खरीदार नहीं मिल पा रहे हैं। जिला उद्यान अधिकारी सतीश कुमार शर्मा के अनुसार नाशपाती की खरीद के लिए क्रय केंद्र नहीं खोले जाते हैं। उनका कहना है कि किसान नाशपाती का स्थानीय स्तर पर मूल्य संवर्धित उत्पाद तैयार कर लाभ कमा सकते हैं।
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हर साल कट रहे हैं नाशपाती के हजारों पेड़
चंपावत। जिले में बीते एक दशक से नाशपाती की पैदावार में भले ही बढ़ोतरी हुई है, लेकिन नाशपाती का समुचित मूल्य न मिलने पर हर साल बड़ी संख्या में नाशपाती के पेड़ काटे जा रहे हैं। गिरधर सिंह, गोपाल सिंह, सतीश चंद्र आदि किसानों ने बताया कि जिले में नाशपाती से संबंधित खाद्य प्रसंस्करण उद्योग न होने के कारण प्रतिवर्ष पांच हजार से अधिक नाशपाती के पेड़ काटे जा रहे हैं।
धार्मिक अनुष्ठान में इस्तेमाल होती है नाशपाती
चंपावत। नाशपाती का प्रयोग धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है। काशी विश्वनाथ पीठ में प्रसाद के तौर पर नाशपाती चढ़ाई जाती है। पर्यावरण विशेषज्ञ सीबी ओली के अनुसार नाशपाती का एक पेड़ औसतन सौ वर्ष तक फल उत्पादित करता है। इसमें प्रचुर मात्रा में प्राकृतिक शुगर मौजूद रहती है।
दो वर्ष पूर्व तक मैदानी क्षेत्र से आने वाले आढ़ती नाशपाती खरीद कर ले जाते थे। इससे प्रतिवर्ष 40 से 50 हजार रुपये की आमदनी होती थी। इस बार नाशपाती नहीं बिकी।
महेश जोशी।
कोरोना के कारण दो साल से नाशपाती उत्पादकों को करारी चपत लगाई है। दो साल से नाशपाती के खरीदार न मिलने के कारण उत्पादकों को काफी नुकसान उठाना पड़ा है।
देवेंद्र ओली।
स्थानीय स्तर पर नाशपाती से संबंधित फल प्रसंस्करण उद्योग न होने से दो साल से नाशपाती उत्पादकों के पेड़ों में ही सड़ रही है। सरकार की ओर से भी राहत नहीं दी जा रही है।
परमानंद परध्यानी।
जिले में कोरोना महामारी के कारण बीते दो साल से नाशपाती को बाजार न मिलने से छोटे तबके के नाशपाती उत्पादक किसानों को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है।
मनोज कलखुड़िया।
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चंपावत। कोरोना के कारण दो साल से जिले के नाशपाती उत्पादकों को करारी चपत लगी है। जिले में 350 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल में उत्पादित नाशपाती की विभिन्न प्रजातियों को लगातार दूसरे वर्ष भी खरीदार नहीं मिल पाए। इस कारण अधिकतर फल उत्पादकों की नाशपाती पेड़ों में ही सड़ने से आर्थिक नुकसान हो गया है। स्थानीय स्तर पर फल प्रसंस्करण उद्योगों की कमी के कारण फल उत्पादकों को भी काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
पर्वतीय क्षेत्र में गोल, ककड़िया, तुमड़िया, जाकलिन आदि प्रजातियों की नाशपाती का उत्पादन होता है लेकिन इसके लिए विपणन की कोई सरकारी व्यवस्था न होने से उत्पादकों को परेशानी हो रही है।
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नाशपाती उत्पादक दिनेश चंद्र पांडेय, हरीश चंद्र, त्रिलोचन आदि को दो साल से नाशपाती के खरीदार नहीं मिल पा रहे हैं। जिला उद्यान अधिकारी सतीश कुमार शर्मा के अनुसार नाशपाती की खरीद के लिए क्रय केंद्र नहीं खोले जाते हैं। उनका कहना है कि किसान नाशपाती का स्थानीय स्तर पर मूल्य संवर्धित उत्पाद तैयार कर लाभ कमा सकते हैं।
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हर साल कट रहे हैं नाशपाती के हजारों पेड़
चंपावत। जिले में बीते एक दशक से नाशपाती की पैदावार में भले ही बढ़ोतरी हुई है, लेकिन नाशपाती का समुचित मूल्य न मिलने पर हर साल बड़ी संख्या में नाशपाती के पेड़ काटे जा रहे हैं। गिरधर सिंह, गोपाल सिंह, सतीश चंद्र आदि किसानों ने बताया कि जिले में नाशपाती से संबंधित खाद्य प्रसंस्करण उद्योग न होने के कारण प्रतिवर्ष पांच हजार से अधिक नाशपाती के पेड़ काटे जा रहे हैं।
धार्मिक अनुष्ठान में इस्तेमाल होती है नाशपाती
चंपावत। नाशपाती का प्रयोग धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है। काशी विश्वनाथ पीठ में प्रसाद के तौर पर नाशपाती चढ़ाई जाती है। पर्यावरण विशेषज्ञ सीबी ओली के अनुसार नाशपाती का एक पेड़ औसतन सौ वर्ष तक फल उत्पादित करता है। इसमें प्रचुर मात्रा में प्राकृतिक शुगर मौजूद रहती है।
दो वर्ष पूर्व तक मैदानी क्षेत्र से आने वाले आढ़ती नाशपाती खरीद कर ले जाते थे। इससे प्रतिवर्ष 40 से 50 हजार रुपये की आमदनी होती थी। इस बार नाशपाती नहीं बिकी।
महेश जोशी।
कोरोना के कारण दो साल से नाशपाती उत्पादकों को करारी चपत लगाई है। दो साल से नाशपाती के खरीदार न मिलने के कारण उत्पादकों को काफी नुकसान उठाना पड़ा है।
देवेंद्र ओली।
स्थानीय स्तर पर नाशपाती से संबंधित फल प्रसंस्करण उद्योग न होने से दो साल से नाशपाती उत्पादकों के पेड़ों में ही सड़ रही है। सरकार की ओर से भी राहत नहीं दी जा रही है।
परमानंद परध्यानी।
जिले में कोरोना महामारी के कारण बीते दो साल से नाशपाती को बाजार न मिलने से छोटे तबके के नाशपाती उत्पादक किसानों को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है।
मनोज कलखुड़िया।