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Champawat News: नदियों की मछलियों को पहली बार तालाब में तैराने की तैयारी

Sat, 06 Dec 2025 10:53 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, चम्पावत
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्पावत Updated Sat, 06 Dec 2025 10:53 PM IST
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Preparations to swim river fish in ponds for the first time
चंपावत। पहाड़ की ठंडी नदियों में पाई जाने वाली रहस्यमयी और स्वादिष्ट मछलियां अब वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं और तालाबों तक पहुंचने वाली हैं। नदियों की गहराइयों में छिपे स्नो ट्राउट और असेला मछली के भोजन और व्यवहार के रहस्य को सामने लाया जाएगा। इस महत्वाकांक्षी परियोजना की शुरुआत मार्च 2026 से होने जा रही है।
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केंद्रीय मत्स्य प्रायोगिक केंद्र मुड़ियानी के प्रायोगिक केंद्र के वैज्ञानिक इन मछलियों के लार्वल फीड (शिशु आहार) पर शोध करेंगे। खास बात यह है कि असेला मछली अब तक केवल नदियों और झरनों में ही पाई जाती है। इसे कभी तालाबों में पाले जाने का प्रयास नहीं हुआ। अब पहली बार वैज्ञानिक इसके बच्चों के लिए विशेष आहार विकसित करेंगे।
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कई राज्यों में होगा अध्ययन

यह शोध कार्य करीब तीन वर्ष तक चलेगा। इसके तहत उत्तराखंड के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और नॉर्थ ईस्ट राज्यों में पाई जाने वाली असेला मछली का गहन अध्ययन किया जाएगा। लंबे शोध के बाद इसके लार्वा के लिए विशेष भोजन तैयार किया जाएगा।
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ऐसे तालाबों तक पहुंचेगी नदी की मछली
जब लार्वल फीड तैयार हो जाएगा तब असेला मछली को स्थानीय जल स्रोतों के साथ-साथ मत्स्य पालकों के तालाबों में पालने के लिए प्रेरित किया जाएगा। इसी तरह स्नो ट्राउट के लिए भी गुणवत्ता युक्त आहार विकसित किया जाएगा। इससे मछली की ग्रोथ, वजन, पोषण और उत्पादन क्षमता को लेकर महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आएंगी।
इसलिए खास है असेला
पहाड़ों की नदियों में पाई जाने वाली असेला मछली स्वादिष्ट होने के साथ-साथ औषधीय गुणों से भी भरपूर मानी जाती है। स्थानीय लोग इसे नदियों से पकड़कर बाजार में बेचते हैं, जहां इसका अच्छा दाम मिलता है। बिना पाले ही यह मछली 300 से 350 रुपये प्रति किलो तक बिक जाती है।


कोट
स्नो ट्राउट और असेला मछली का पालन रैनबो ट्राउट और कॉमन कार्प के साथ एक बेहतर विकल्प बन सकता है। इससे मत्स्य पालकों की आय दोगुनी होने की उम्मीद है। अभी तक विशेषज्ञों के पास स्नो ट्राउट के भोजन से जुड़ी कोई ठोस जानकारी उपलब्ध नहीं है। ऐसे में यह शोध भविष्य में कई राज खोलेगा। -डॉ. पंकज कुमार, वैज्ञानिक, केंद्रीय मत्स्य प्रायोगिक केंद्र मुड़ियानी
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