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चंपावत कोतवाली में एक भी महिला दरोगा नहीं
ब्यूरो/अमर उजाला, चंपावत
Updated Sat, 14 Nov 2015 10:41 PM IST
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उत्तराखंड राज्य बनने के बाद स्थापित चंपावत कोतवाली के हाल भी कम अजब नहीं है। जिले की इस पहली कोतवाली में एक भी महिला दरोगा नहीं है। इतना ही नहीं यहां महिला सिपाहियों के पद भी सृजित नहीं है। अलबत्ता इधर-उधर से जरूर कुछ महिला सिपाहियों को यहां संबद्ध किया गया है।
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शहर से करीब चार किलोमीटर दूर एनएच पर स्थित चंपावत कोतवाली के पास अपना भवन भी है और अन्य जरूरी सुविधाएं भी, लेकिन चार साल पहले तक यह कोतवाली टीनशेड पर चला करती थी। कोतवाली बनने के बाद शांति व्यवस्था पहले से पुख्ता हुई, लेकिन फिर भी यहां स्टाफ की तस्वीर बेढंगी है। सृजित पद तो कम हैं, लेकिन तैनाती अधिक है।
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कोतवाल देवेंद्र सिंह दिगारी के मुताबिक कोतवाली में दो दरोगा के सापेक्ष तीन, कांस्टेबल के 14 पदों के सापेक्ष 30 कार्यरत हैं। महिला सिपाही का एक भी पद यहां नहीं है पर तैनाती 6 सिपाहियों की है। हां महिला दरोगा जरूर नहीं है। महिला उप निरीक्षक नहीं होने से महिलाओं से संबंधित घटनाओं की पड़ताल पर असर पड़ता है।
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13 किलोमीटर दूर होती थी एफआईआर
चंपावत में हुई आपराधिक वारदात की प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) चंपावत में नहीं होती थी। 2003 तक यहां की एफआईआर 13 किलोमीटर दूर लोहाघाट होती थी।
सात साल बाद बना मुख्यालय में थाना
सितंबर 1997 में चंपावत जिले का गठन हुआ, लेकिन यहां पुलिस की कोतवाली की स्थापना इसके कई वर्षों बाद हुई। मुख्यालय के बाद भी रिपोर्ट लोहाघाट थाने में लिखी जाती थी। 2004 में चंपावत में कोतवाली खुलने के बाद यह स्थिति बदली।
कोतवाली में सृजित पदों की संख्या यहां की जरूरतों के हिसाब से कम है। इस वजह से पुलिस लाइन और अन्य जगहों से यहां व्यवस्था की गई है। अतिरिक्त पदों को सृजित करने की पहल हो रही है। -दिलीप सिंह कुंवर, एसपी, चंपावत।