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पौधे लगाओं ही नहीं अकाल मौत से भी बचाओ!
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पाटी में पौधारोपण करतीं महिलाएं।
- फोटो : CHAMPAWAT
चंपावत। इस साल जिलेभर में दस लाख पौधों को लगाने का लक्ष्य रखा गया था, अभी ये आकड़ा नहीं मिला है कि कितने पौधे वास्तव में लग सके। मगर पुराने अनुभव और आकड़ें बताते हैं कि पौधों को लगाना आसान है, बड़ी चुनौती उन्हें बचाना है। वन विभाग द्वारा लगाए गए पौधों में से 60 फीसदी पौधे अकाल मौत के शिकार होते हैं। पौधों को नुकसान की मुख्य वजह घेरबाड़ की कमी से जानवरों द्वारा नष्ट किया जाना है।
चंपावत वन प्रभाग के छह रेंजों में 65980.12 हेक्टेयर आरक्षित, 34375.95 पंचायती और 22815.70 हेक्टेयर सिविल वन है। वन विभाग के आकड़ों के मुताबिक नवंबर 2000 में राज्य बनने के बाद से अब तक 8024.54 हेक्टेयर जमीन में 88.27 लाख पौधे लगाए गए हैं। इन्हें रोपित करने में 8.15 करोड़ रुपये का खर्च आया। मगर इसमें से 35.61 लाख पौधे जीवित नहीं रह सके। देखरेख की कमी से लेकर अलग-अलग कारणों से इन पौधों की अकाल मौत हो गई। 52.66 लाख (59.66 प्रतिशत) पौधे ही बच सके। सामान्य रूप से दो पौधों के बीच में दो मीटर का फासला रखा जाता है। विभाग के मुताबिक एक हेक्टेयर क्षेत्र में 1100 पौधे रोपना आदर्श स्थिति है।
कोट
आदर्श स्थिति यह है कि रोपित पौधों में से 90 फीसदी सुरक्षित रह सके। इसके लिए वन विभाग कार्ययोजना बनाता है। जानवरों से पौधों की सुरक्षा के लिए झाडिय़ों, कांटों व अन्य तरीके से घेरबाड़ की जाती है। पौधों के विकास के लिए निराई-गुड़ाई कराई जाती है। सभी रेंजों को पौधों की सुरक्षा का जिम्मा भी दिया जाता है। लेकिन इसके बावजूद पौधों का नुकसान लक्ष्य से ज्यादा रहता है। विभाग पुरानी खामियों से सीख ले जरूरी कदम उठाएगा।
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एमएम भट्ट,
प्रभारी डीएफओ,
धरती को बचाने के लिए हरियाली जरूरी है। हरियाली के लिए पौधों को लगाना बुनियादी काम है। मगर पौधों को लगाने के साथ उन्हें बचाने को आदत में शुमार करना होगा। इसके लिए आमतौर पर लोगों में जुनून कम रहता है। पौधों को बचाने के लिए हनुरमंद किए जाने की जरूरत है। अन्यथा गड्ढों को खोदने से पौधे रोपने की सारा श्रम व खर्च व्यर्थ हो जाएगा।
गौरव साहनी,
जल संसाधन विशेषज्ञ।
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चंपावत वन प्रभाग के छह रेंजों में 65980.12 हेक्टेयर आरक्षित, 34375.95 पंचायती और 22815.70 हेक्टेयर सिविल वन है। वन विभाग के आकड़ों के मुताबिक नवंबर 2000 में राज्य बनने के बाद से अब तक 8024.54 हेक्टेयर जमीन में 88.27 लाख पौधे लगाए गए हैं। इन्हें रोपित करने में 8.15 करोड़ रुपये का खर्च आया। मगर इसमें से 35.61 लाख पौधे जीवित नहीं रह सके। देखरेख की कमी से लेकर अलग-अलग कारणों से इन पौधों की अकाल मौत हो गई। 52.66 लाख (59.66 प्रतिशत) पौधे ही बच सके। सामान्य रूप से दो पौधों के बीच में दो मीटर का फासला रखा जाता है। विभाग के मुताबिक एक हेक्टेयर क्षेत्र में 1100 पौधे रोपना आदर्श स्थिति है।
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आदर्श स्थिति यह है कि रोपित पौधों में से 90 फीसदी सुरक्षित रह सके। इसके लिए वन विभाग कार्ययोजना बनाता है। जानवरों से पौधों की सुरक्षा के लिए झाडिय़ों, कांटों व अन्य तरीके से घेरबाड़ की जाती है। पौधों के विकास के लिए निराई-गुड़ाई कराई जाती है। सभी रेंजों को पौधों की सुरक्षा का जिम्मा भी दिया जाता है। लेकिन इसके बावजूद पौधों का नुकसान लक्ष्य से ज्यादा रहता है। विभाग पुरानी खामियों से सीख ले जरूरी कदम उठाएगा।
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एमएम भट्ट,
प्रभारी डीएफओ,
धरती को बचाने के लिए हरियाली जरूरी है। हरियाली के लिए पौधों को लगाना बुनियादी काम है। मगर पौधों को लगाने के साथ उन्हें बचाने को आदत में शुमार करना होगा। इसके लिए आमतौर पर लोगों में जुनून कम रहता है। पौधों को बचाने के लिए हनुरमंद किए जाने की जरूरत है। अन्यथा गड्ढों को खोदने से पौधे रोपने की सारा श्रम व खर्च व्यर्थ हो जाएगा।
गौरव साहनी,
जल संसाधन विशेषज्ञ।