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झिलमिलताल दिन भर में सात बार रंग बदलती है
अमर उजाला ब्यूरो टनकपुर (चंपावत)।
Updated Thu, 15 Jun 2017 11:06 PM IST
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झिलमिलताल में मछलियों को चावल खिलाते लोग
- फोटो : अमर उजाला
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इन दिनों उत्तर भारत के प्रमुख धार्मिक स्थल मां पूर्णागिरि धाम में प्रति दिन हजारों श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। मां के दर्शन के बाद श्रद्धालु टनकपुर से सटे नेपाल के झिलमिल ताल के प्राकृतिक सौंदर्य का लुत्फ भी उठा रहे हैं। मान्यता है कि यह झील दिन भर में सात बार रंग बदलती है। श्रद्धालु व पर्यटक झील में पत्थर चट्टा प्रजाति की मछलियों को चावल खिलाकर पुण्य कमाते हैं। प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के उमड़ने से इन दिनों झील के आस पास काफी चहल पहल बनी हुई है।
टनकपुर से सटी नेपाल की ब्रहमदेव मंडी से करीब आठ किमी दूूर स्थित 6800 वर्ग मीटर में फैली सिद्देश्वर झिलमिलताल झील का गहरा धार्मिक महत्व है। मंदिर के पुजारी रमानंद गिरि के अनुसार मान्यता है कि मां पूर्णागिरि इसी पावन झील में स्नान किया करती थी। झील के किनारे मां झिलमिल का मंदिर बना है, जहां पूजा-अर्चना करने से हर मन्नत पूरी होती है। कुछ लोग इस झील को पांडवों की उत्पत्ति भी मानते हैं। कहा जाता है कि पांडवों ने यहां विश्राम के दौरान प्यास बुझाने को इस झील की उत्पत्ति की थी। झील के ऊपर की पहाड़ी में भीम ने बड़े से पत्थर में घुटना मारकर पानी का स्रोत पैदा किया।
यह पत्थर आज भी वहां मौजूद है। झील में पत्थर चट्टा प्रजाति की मछलियां खासी तादात में हैं। इनको मारने पर पूरी तरह से प्रतिबंध है, यह भी मान्यता है कि झील में मौजूद मछलियों का आकार एक समान रहता है। झील में स्नान करना पूर्णरूप से प्रतिबंधित है। खासतौर पर महिलाएं झील से पानी नहीं भर सकतीं हैं। कहा जाता है कि इसके बगल में भी पहले एक और झील थी, जिसमें भूलवश एक महिला के स्नान करने के कारण वह सूख गई।
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हर माह की पूर्णमासी को बड़ी संख्या में श्रद्धालु उमड़ते हैं। आस-पास के लोगों के साथ ही भारतीय क्षेत्र से भी बड़ी संख्या में लोग झील के दर्शन को पहुंचते हैं। नेपाल सरकार ने धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए अब ब्रह्मदेव मंडी से आठ किमी पर सात किमी सड़क बना दी है। इससे आगे एक किमी का पहाड़ का सफर पैदल पगडंडी के सहारे पूरा किया जाता है पिछले कुछ सालों से पूर्णागिरी मेले के दौरान झील को देखने के लिए पर्यटक व श्रद्धालुओं के पहुंचने से इस क्षेत्र में काफी चहल पहल हो रही है। यह झील अब नेपाल के सीमांत क्षेत्र के विकास में भी अहम भूमिका निभाने लगी है।
मंदिर समिति मुहैया कराती है सुविधाएं
सिद्ध सरोवर झिलमिल ताल के धार्मिक महत्व को ध्यान में रखकर मंदिर समिति की ओर से अब श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए अनेक व्यवस्थाएं की जा रही हैं। समिति के अध्यक्ष मोती मेहता ने बताया कि श्रद्धालुओं को खाना बनाने व रहने के लिए कंबल, वर्तन आदि नि:शुल्क उपलब्ध कराए जा रहे हैं। एक धर्मशाला बनाई हैं, जहां आकर श्रद्धालु विश्राम करते हैं।
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टनकपुर से सटी नेपाल की ब्रहमदेव मंडी से करीब आठ किमी दूूर स्थित 6800 वर्ग मीटर में फैली सिद्देश्वर झिलमिलताल झील का गहरा धार्मिक महत्व है। मंदिर के पुजारी रमानंद गिरि के अनुसार मान्यता है कि मां पूर्णागिरि इसी पावन झील में स्नान किया करती थी। झील के किनारे मां झिलमिल का मंदिर बना है, जहां पूजा-अर्चना करने से हर मन्नत पूरी होती है। कुछ लोग इस झील को पांडवों की उत्पत्ति भी मानते हैं। कहा जाता है कि पांडवों ने यहां विश्राम के दौरान प्यास बुझाने को इस झील की उत्पत्ति की थी। झील के ऊपर की पहाड़ी में भीम ने बड़े से पत्थर में घुटना मारकर पानी का स्रोत पैदा किया।
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यह पत्थर आज भी वहां मौजूद है। झील में पत्थर चट्टा प्रजाति की मछलियां खासी तादात में हैं। इनको मारने पर पूरी तरह से प्रतिबंध है, यह भी मान्यता है कि झील में मौजूद मछलियों का आकार एक समान रहता है। झील में स्नान करना पूर्णरूप से प्रतिबंधित है। खासतौर पर महिलाएं झील से पानी नहीं भर सकतीं हैं। कहा जाता है कि इसके बगल में भी पहले एक और झील थी, जिसमें भूलवश एक महिला के स्नान करने के कारण वह सूख गई।
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हर माह की पूर्णमासी को बड़ी संख्या में श्रद्धालु उमड़ते हैं। आस-पास के लोगों के साथ ही भारतीय क्षेत्र से भी बड़ी संख्या में लोग झील के दर्शन को पहुंचते हैं। नेपाल सरकार ने धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए अब ब्रह्मदेव मंडी से आठ किमी पर सात किमी सड़क बना दी है। इससे आगे एक किमी का पहाड़ का सफर पैदल पगडंडी के सहारे पूरा किया जाता है पिछले कुछ सालों से पूर्णागिरी मेले के दौरान झील को देखने के लिए पर्यटक व श्रद्धालुओं के पहुंचने से इस क्षेत्र में काफी चहल पहल हो रही है। यह झील अब नेपाल के सीमांत क्षेत्र के विकास में भी अहम भूमिका निभाने लगी है।
मंदिर समिति मुहैया कराती है सुविधाएं
सिद्ध सरोवर झिलमिल ताल के धार्मिक महत्व को ध्यान में रखकर मंदिर समिति की ओर से अब श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए अनेक व्यवस्थाएं की जा रही हैं। समिति के अध्यक्ष मोती मेहता ने बताया कि श्रद्धालुओं को खाना बनाने व रहने के लिए कंबल, वर्तन आदि नि:शुल्क उपलब्ध कराए जा रहे हैं। एक धर्मशाला बनाई हैं, जहां आकर श्रद्धालु विश्राम करते हैं।