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जलियांवाला बाग गोली कांड के कारण आजादी की लड़ाई में कूदे थे प्रथोली

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Sat, 03 Apr 2021 11:35 PM IST
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Jallianwala Bagh jumped in the fight for freedom due to bullet incident
लाल सिंह प्रथोली, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी। - फोटो : CHAMPAWAT
चंपावत। जिले के सीमांत गुमदेश क्षेत्र के जाख जिंडी में चार अप्रैल 1904 को जन्मे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय लाल सिंह प्रथोली ने देश की आजादी के लिए लड़ी गई लड़ाई में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। 1918 में प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद 14 अप्रैल 1919 को हुए जलियांवाला बाग गोली कांड सैकड़ों भारतीय के मारे जाने की घटना ने लाल सिंह प्रथोली के जीवन को ही बदल दिया। इसके बाद वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में कूद गए।
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उन्होंने 1942 में अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। इतिहासकार डॉ.प्रशांत जोशी के अनुसार अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रियता के चलते उनके लिए गिरफ्तारी वारंट जारी किया। अंग्रेजी हुकूमत की हिदायत थी कि यदि लाल सिंह पकड़ में आए और भागने का प्रयास करे तो उसे गोली मार कर घायल कर दिया जाए। लेकिन लाल सिंह अंग्रेजों के हाथ नहीं आए और लगातार दो वर्षों तक भूमिगत रहकर आजादी की लड़ाई में योगदान देते रहे। अंग्रेजी सरकार की आंख की किरकिरी बन चुके लाल सिंह प्रथोली पर दस रुपये का जुर्माना भी लगाया था।
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जुर्माने की अदायगी के लिए उन्होंने अपने खेत खलिहान तक बेच दिए थे। 15 अगस्त 1947 को देश की आजादी मिलने के बाद वह विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों के विकास में जुटे रहे और 25 दिसंबर 1971 को 68 वर्ष की आयु में उनका देहावसान हुआ था। (संवाद)
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बचपन से ही गोरी सरकार के विरोधी थे लाल सिंह
चंपावत। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के परिजनों के अनुसार वर्ष 1914 में जब प्रथम विश्व युद्ध प्रारंभ हुआ, उस समय लाल सिंह की उम्र महज दस साल थी। वह बचपन से ही गोरी सरकार के विरोधी थे। बालक लाल सिंह बुजुर्गों से गोरी सरकार के अन्याय और अत्याचार की बातें सुनकर उनसे बदला लेने की सौगंध लेता था।(संवाद)

साथियों के साथ खेलने में दिखाते थे दमखम
चंपावत। लाल सिंह प्रथोली बचपन से ही साथियों के साथ खेलकूद में दमखम दिखाते थे। साथियों से खेलने के दौरान में किसी दबाव में नहीं रहते थे। यही खासियत उनको अन्यों से अलग बनाती थी। (संवाद)
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