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अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस : घरेलू हिंसा के शिकार होने पर भी थानों से कन्नी काटते हैं पुरुष

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Thu, 18 Nov 2021 11:48 PM IST
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International Men's Day: Even after being a victim of domestic violence, men beat the police station
International Men's Day: Even after being a victim of domestic violence, men beat the police station
चंपावत। लेडीज फर्स्ट... अब ये वाक्य आम है, होना भी चाहिए। महिला शक्ति का सम्मान भला क्यों न हो? लेकिन कई बार जाने-अनजाने में पुरुष प्रधान समाज में खुद पुरुष ही भेदभाव और उत्पीड़न के शिकार हो जाते हैं। ऐसा कई बार इस जिले में भी हुआ है। पर समाज में उनके साथ हुए अन्याय को बहाना मान लिया जाता है। ऐसे में पुरुष थाने की चौखट तक जाने का साहस नहीं कर पाता है। एक अनुमान के मुताबिक चंपावत जिले में घरेलू हिंसा में 15 प्रतिशत पुरुष भी पीड़ित होते हैं, लेकिन ज्यादातर मामले थाने तक नहीं पहुंचते हैं। घरेलू हिंसा के ज्यादातर मामले किसी अन्य से अफेयर, गलतफहमी और सास-ससुर को ज्यादा तवज्जो देने से संबंधित हैं।
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चंपावत जिले में एक शिक्षक थे। सरल और सज्जन स्वभाव के, लेकिन पत्नी और ससुरालियों ने उन्हें दहेज के मामले में फंसा दिया। दरअसल, पत्नी और ससुरालियों ने शिक्षक को माता-पिता से अलग रहने को कहा। शिक्षक ने इससे मना किया और पत्नी को समझाया, लेकिन बात नहीं बनी। उसके बाद ससुरालियों ने दहेज उत्पीड़न का मामला लगा दिया।
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एक अन्य मामला पत्नी का किसी अन्य के साथ जाने का रहा। परेशान पति ने पत्नी की गुमशुदगी दर्ज कराई, लेकिन कोई हल नहीं निकला। एडवोकेट नरेश ढेक कहते हैं कि पारिवारिक विवाद के समाधान के लिए परामर्श सबसे महत्वपूर्ण है। इस रास्ते को अपनाया जाना चाहिए।
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स्वास्थ्य कर्मी पिता ने नहीं होने दी मां की कमी...
पत्नी की मौत के बाद बच्चों के लिए पिता के साथ मां का दुलारा भी दिया
चंपावत। पत्नी की मौत के बाद 45 साल के स्वास्थ्य कर्मी ड्यूटी और परिवार संभालने की दोहरी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। विभागीय दायित्व को पूरी जिम्मेदारी से करने के बाद वे घर में अपने तीन बच्चों की बेहतर परवरिश कर रहे हैं। पत्नी का बीमारी से चार साल पहले निधन हुआ तो परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट गया। घर में छोटे बच्चों की देखभाल से लेकर उन्हें पिता ही नहीं मां का दुलार देने की चुनौती थी। उन्होंने चुनौतियों का सामना कर घर-बाहर की जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाया और जिंदगी की गाड़ी पटरी पर दौड़ने लगी।

मेरे पापा मेरे हीरो...
लोहाघाट (चंपावत)। लोहाघाट की शगुन के लिए उसके पिता दीपक ओली हीरो हैं। शगुन कहती हैं कि उसके पापा व्यापार में व्यस्तता के बावजूद उसे सही राह पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। मेरे साथ खेलने और घूमने के लिए समय निकालते हैं। साथ ही बुराइयों से दूर रहने की नसीहत देते हैं।
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