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कभी तेल के दीपक के उजाले में होती थी रामलीला

Wed, 14 Oct 2015 10:22 PM IST
नवल जोशी/अमर उजाला, लोहाघाट
नवल जोशी/अमर उजाला, लोहाघाट Updated Wed, 14 Oct 2015 10:22 PM IST
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कभी सरसों के तेल के दीपक से शुरू हुई लोहाघाट की रामलीला अब बिजली की चकाचौंध में अपने 115वें वर्ष में प्रवेश कर गई है। रामलीला में हिंदुओं के अलावा अन्य संप्रदाय के लोगों की हिस्सेदारी इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। यहां की रामलीला को संवारने में कनौजिया परिवार की भी अहम भूमिका रही है। गौरी और दुर्गा के पात्रों के वस्त्रों का रखरखाव एवं मेकअप का कार्य यह लोग धार्मिक भावना से करते थे।

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जीआईसी के पूर्व शिक्षक मनोहर लाल वर्मा ने इस रामलीला को अपना कलात्मक रूप दिया। अंग्रेजी शासन में लीला को निखारने के लिए अंग्रेजों का भी काफी योगदान रहा है। टलक साहब  के यहां आई एक महिला अंग्रेज ने रामलीला के लिए राम दरबार का पर्दा अपने हाथ से बनाकर भेंट किया। यह पर्दा चार दशकों तक चलता रहा। महान क्रांतिकारी हर्षदेव ओली उस दौरान अंग्रेजों के भाषणों का लीला के दौरान हिंदी रूपांतर किया करते थे। बाद में यहां के प्रसिद्ध ऋषेश्वर महादेव मंदिर में आए बालक बाबा ने भी लीला को और बुलंदियों तक पहुंचाया। 60 का दशक यहां की रामलीला का स्वर्णिम काल था, तब लोग 50 किमी से अधिक की दूरी तय कर यहां रामलीला का भक्तिभाव से आनंद लेने आते थे। तब उनका पड़ाव यहां की धर्मशालाएं हुआ करती थीं। यहां के रामलीला मंच को बनाने की बुनियाद में एसएसबी संगठन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
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80 के दशक तक यहां के कलाकारों का स्वर इतना लयबद्ध एवं ऊंचा होता था कि यहां लाउडस्पीकर की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। दर्शकों में इतना अनुशासन होता था कि किसी भी बुजुर्ग के खामोश रहने का इशारा देने पर लोग शांत हो जाया करते थे।
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मुस्लिम भी बंटाते आ रहे हैं हाथ
सांप्रदायिक सद्भाव की मिशाल भी रामलीला की परंपरा को बढ़ाने में मददगार रही है। शुरुआत में व्यापारी मोहम्मदी, स्टेशन बाजार के अहमदी और राहत हुसैन ने अपनी कला का जौहर दिखाया। बाद में इस काम को राहत के पुत्र तस्लीम ने आगे बढ़ाया। उस वक्त मेहबुल्ला साहब तालीम से लेकर रामलीला के मंचन तक बगैर पैसे पैट्रोमैक्स ठीक कर उन्हें जलाने का काम करते थे। मो.इदरीश पूरे समय लीला के कार्यों में जुटे रहते थे। बाद में जब्बार आदि युवकों ने इस काम को अपने हाथ में लिया।

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