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अस्पताल उच्चीकृत हुआ, पर स्वास्थ्य सेवाएं बदतर हुई

Fri, 20 Oct 2017 10:07 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, चंपावत।
अमर उजाला ब्यूरो, चंपावत। Updated Fri, 20 Oct 2017 10:07 PM IST
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Hospital increased, but healthcare services worsened
डॉक्टरविहीन बनबसा अस्पताल में मरीज का परीक्षण करते फार्मेसिस्ट। - फोटो : अमर उजाला
 नेपाल व ऊधमसिंह नगर जिले से लगा बनबसा जिले का प्रवेशद्वार है। चंपावत के विधायक कैलाश चंद्र गहतोड़ी का आवास भी बनबसा में है, लेकिन इसके बावजूद यहां की स्वास्थ्य सेवा सुधरने के बजाय पहले से अधिक बीमार हो गई है। राजकीय एलोपैथिक डिस्पेंसरी (एसएडी) को उच्चीकृत कर इस साल इसे अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (एपीएचसी) का दर्जा तो मिल गया, लेकिन इसकी हालत बेहतर नहीं हो पाई है। सवा साल से बिना डॉक्टर के चल रहे अस्पताल की बागडोर एक अदद फार्मेसिस्ट के हवाले है।  लोग मजबूरी में 12 किमी दूर टनकपुर या खटीमा दौड़ जाने को मजबूर हैं।  
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नेपाल सीमा से लगे बनबसा को दो वर्ष पूर्व ग्राम पंचायत के स्थान पर नगर पंचायत बना दिया गया था। बनबसा और आसपास की करीब 11 हजार की आबादी के अलावा नेपाल के कंचनपुर जिले की निर्भरता यहां के कारोबार से लेकर अस्पताल तक में है। मगर बनबसा के सरकारी अस्पताल के हाल बुरे बने हुए हैं। लोगों को इसका कतई लाभ नहीं मिल पा रहा है। पिछले साल डॉ.नरेंद्र चंद के सेवानिवृत्त होने के बाद से यहां किसी भी डॉक्टर को भेजा नहीं गया। अस्पताल पूरी जिम्मेदारी फार्मेसिस्ट दयाशंकर गुप्ता के कंधों पर है। गुप्ता बताते हैं कि डॉक्टर नहीं होने से आमतौर पर मरीजों की आमद कम होती है। औसतन महीने में करीब 500 मरीज आते हैं। 
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उनके परीक्षण से लेकर दवा देने तक की जिम्मेदारी फार्मेसिस्ट की ही है। वैसे अस्पताल में डॉक्टर, फार्मेसिस्ट के अलावा वार्ड ब्वाय व सफाई कर्मी के पद सृजित हैं, लेकिन तैनाती सिर्फ फार्मेसिस्ट की ही है। स्वच्छ भारत अभियान के बावजूद स्वच्छता के लिए  एक अदद नियमित सफाई कर्मी भी नहीं है। दैनिक वेतनभोगी स्वच्छक के जरिये सफाई का काम चलाया जा रहा है।  
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आवास में चल रही डिग्री कॉलेज की कक्षाएं  
बनबसा अस्पताल की इमारत भव्य है। सरकारी अस्पताल के साथ आवासीय भवन भी बने हैं। लेकिन यह भव्य इमारत इलाज में नाकाम है। आवासीय भवन के एक हिस्से में बनबसा के राजकीय डिग्री कॉलेज की कक्षाएं चल रही है।  

हो रही स्वास्थ्य सेवाओं की अनदेखी : प्रेम  
बनबसा निवासी व उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी प्रेम चंद कहते हैं कि अस्पताल को एसएडी से उच्चीकृत कर एपीएचसी का दर्जा तो दिया गया, लेकिन इलाज की सुविधा का स्तर घट गया है। एसएडी के दौर में डॉक्टर थे, लेकिन अब मरीजों के लिए डॉक्टर की व्यवस्था नहीं है।  
कोट  
चंपावत जिले में डॉक्टरों के सृजित 94 पदों के सापेक्ष महज 43 की तैनाती है। डॉक्टरों की भारी कमी से परेशानी हो रही है। बनबसा एपीएचसी में तैनात डॉ.नरेंद्र चंद की सेवानिवृत्त के बाद से फिलहाल किसी की तैनाती नहीं हो सकी है। डॉक्टर की तैनाती के लिए उच्चाधिकारियों से पत्राचार किया जा रहा है।  

डॉ.एमएस बोहरा, मुख्य चिकित्साधिकारी, चंपावत।  

कोट  
स्वास्थ्य सेवाएं भाजपा सरकार की प्राथमिकताओं में हैं। जून में टनकपुर-बनबसा में हुए मुख्यमंत्री के भ्रमण के दौरान भी इस मसले को उठाया गया था। चंपावत जिले की स्वास्थ्य सेवा को सुधारने के लिए लोहाघाट सहित कई अस्पतालों में डॉक्टरों की तैनाती की गई है। अलबत्ता बनबसा सहित अन्य अस्पतालों में डॉक्टरों के रिक्त पदों को भरने के लिए संगठन के स्तर से भी पहल की जा रही है।  
हिमेश कलखुड़िया, पूर्व जिलाध्यक्ष, भाजपा चंपावत।
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