{"_id":"6398bf2f514b235ebb484817","slug":"goat-and-ship-in-champawat-champawat-news-hld485154450","type":"story","status":"publish","title_hn":"Champawat News: 44 दिनों बाद आज कलोनिया जंगल पहुंचेगी 400 भेड़ और बकरियां","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Champawat News: 44 दिनों बाद आज कलोनिया जंगल पहुंचेगी 400 भेड़ और बकरियां
विज्ञापन
भेड़ों को पिथौरागढ़ जिले के बड़गांव से चंपावत जिले के कलोनिया ले जाते भेड़पालक इंद्र सिंह। संवा?
- फोटो : CHAMPAWAT
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
चंपावत। पिथौरागढ़ जिले के पशुपालक इंद्र सिंह, जगत सिंह, बहादुर सिंह पांच महीने तक अपनी माटी से दूर रहेंगे। ये पशुपालक इन दिनों 400 भेड़ और बकरियों को चराने के लिए भाबर जा रहे हैं लेकिन लंबी, दुरुह, कठिन यात्रा के दौरान पशुओं का इलाज तो दूर, रास्तेभर पानी तक की सुविधा नहीं है।
चंपावत जिले में एक भी भेड़पालक नहीं है लेकिन पिथौरागढ़ जिले में भेड़पालन बहुतायत में हैं। धारचूला तहसील के बड़ागांव निवासी ये पशुपालक 400 भेड़ और बकरियों के साथ इन दिनों चंपावत जिले से कलोनिया के जंगल की ओर बढ़ रहे हैं लेकिन रास्ते में कहीं भी पशुओं की जांच, इलाज या दवा नहीं मिली। दिवाली के बाद 31 अक्तूबर को अपने गांव बड़ागांव से ये पशुपालक से निकले। रोज औसतन सात से आठ किमी चलते हुए 44 दिनों में 350 किमी की दूरी तय कर सके हैं।
भेड़पालक इंद्र सिंह का कहना है कि बुधवार को वे भेड़-बकरियों के साथ चंपावत जिले में कलोनिया के जंगल पहुंच जाएंगे। जहां जाड़ों भर इन पशुओं को चराएंगे। सर्दी के दौरान भेड़-बकरियों को कलोनिया में चराने के बाद मार्च के शुरू में बड़ागांव लौटेंगे। तीनों पशुपालक बताते हैं कि भेड़-बकरी पालना उनकी पुश्तैनी काम है। आठ से दस हजार रुपये में एक भेड़ बिकती है। सालभर में नौ से दस लाख रुपये की कमाई होती है लेकिन खर्च और मेहनत खूब होने से बचत मुश्किल से दो लाख से भी कम होती है।
विज्ञापन
सुरक्षा और सामान ढोने के लिए साथ हैं घोड़े और कुत्ते
चंपावत। ये पशुपालक हर दिन शाम होते ही रात का इंतजाम कर लेते हैं। बताते हैं कि रात काटने के लिए टेंट का आसरा है तो पानी के पास वाली जगह पर खाना बनाते हैं। टेंट, खाना आदि जरूरी सामग्री के लिए दो घोड़े में लादते हैं। जंगली जानवरों से भेड़, बकरियों की सुरक्षा के लिए तीन कुत्ते भी साथ हैं। इसके बावजूद इस सफर तक आते-आते एक बकरी की मौत हो गई।
30 बकरी मरी लेकिन एक का मुआवजा मिला
चंपावत। भेड़पालक बताते हैं कि भेड़-बकरी पालन मुश्किल हो रहा है। सरकारी स्तर पर कोई मदद नहीं हो रही है। यहां तक कि कुछ समय पहले बीमारी से 30 बकरियां मरीं लेकिन एक बकरी का मुआवजा महज तीन हजार रुपये मिला।
यहां से गुजरने वाले भेड़पालकों का इस जिले में न पंजीकरण है और न सूचना। इस कारण विभाग की ओर से उन्हें कोई सुविधा दिया जाना संभव नहीं है। - डॉ. पीएस भंडारी, सीवीओ, चंपावत।
विज्ञापन
चंपावत जिले में एक भी भेड़पालक नहीं है लेकिन पिथौरागढ़ जिले में भेड़पालन बहुतायत में हैं। धारचूला तहसील के बड़ागांव निवासी ये पशुपालक 400 भेड़ और बकरियों के साथ इन दिनों चंपावत जिले से कलोनिया के जंगल की ओर बढ़ रहे हैं लेकिन रास्ते में कहीं भी पशुओं की जांच, इलाज या दवा नहीं मिली। दिवाली के बाद 31 अक्तूबर को अपने गांव बड़ागांव से ये पशुपालक से निकले। रोज औसतन सात से आठ किमी चलते हुए 44 दिनों में 350 किमी की दूरी तय कर सके हैं।
विज्ञापन
भेड़पालक इंद्र सिंह का कहना है कि बुधवार को वे भेड़-बकरियों के साथ चंपावत जिले में कलोनिया के जंगल पहुंच जाएंगे। जहां जाड़ों भर इन पशुओं को चराएंगे। सर्दी के दौरान भेड़-बकरियों को कलोनिया में चराने के बाद मार्च के शुरू में बड़ागांव लौटेंगे। तीनों पशुपालक बताते हैं कि भेड़-बकरी पालना उनकी पुश्तैनी काम है। आठ से दस हजार रुपये में एक भेड़ बिकती है। सालभर में नौ से दस लाख रुपये की कमाई होती है लेकिन खर्च और मेहनत खूब होने से बचत मुश्किल से दो लाख से भी कम होती है।
विज्ञापन
सुरक्षा और सामान ढोने के लिए साथ हैं घोड़े और कुत्ते
चंपावत। ये पशुपालक हर दिन शाम होते ही रात का इंतजाम कर लेते हैं। बताते हैं कि रात काटने के लिए टेंट का आसरा है तो पानी के पास वाली जगह पर खाना बनाते हैं। टेंट, खाना आदि जरूरी सामग्री के लिए दो घोड़े में लादते हैं। जंगली जानवरों से भेड़, बकरियों की सुरक्षा के लिए तीन कुत्ते भी साथ हैं। इसके बावजूद इस सफर तक आते-आते एक बकरी की मौत हो गई।
30 बकरी मरी लेकिन एक का मुआवजा मिला
चंपावत। भेड़पालक बताते हैं कि भेड़-बकरी पालन मुश्किल हो रहा है। सरकारी स्तर पर कोई मदद नहीं हो रही है। यहां तक कि कुछ समय पहले बीमारी से 30 बकरियां मरीं लेकिन एक बकरी का मुआवजा महज तीन हजार रुपये मिला।
यहां से गुजरने वाले भेड़पालकों का इस जिले में न पंजीकरण है और न सूचना। इस कारण विभाग की ओर से उन्हें कोई सुविधा दिया जाना संभव नहीं है। - डॉ. पीएस भंडारी, सीवीओ, चंपावत।