स्वतंत्रता सेनानी को नहीं मिली जमीन
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चंपावत। उड़ी सैन्य मुख्यालय में हुए हमले में 19 जवानों की शहादत से देेशभर के लोग गमगीन हैं। फौजियों के प्रति संवेदनाओं का ज्वार उमड़ रहा है, मगर हकीकत यह भी है कि कई फौजियों से किए वायदे पूरे नहीं हो सके हैं। चंपावत जिले में तो एक वीरचक्र विजेता सैनिक को दान दी गई जमीन पर सरकार कब्जा तक नहीं दिला पा रही है। यहां तक कि कुछ महीने पूर्व दूसरी जगह जमीन आवंटित करने की मुख्यमंत्री हरीश रावत द्वारा दी गई स्वीकृति भी अधूरी रही है। वीरचक्र विजेता की मौत के बाद परिजनों की ये लड़ाई किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी है।
टनकपुर के आमबाग निवासी सूबेदार चंद्री चंद ने आजादी के फौरन बाद 1948 में पाकिस्तान द्वारा कश्मीर से किए गए हमले में जबर्दस्त बहादुरी दिखाई थी। अदम्य साहस के लिए पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें 1950 में उन्हें वीर चक्र से नवाजा था। 1978 में उप्र सरकार ने छह अन्य पूर्व फौजियों के साथ चंद्री को खटीमा तहसील के बिल्हेरी गांव में 20 बीघा जमीन पुरस्कार में दी थी। पट्टे के साथ ही भूमि के खाता खतौनी भी दिए गए, मगर दान में दी गई जमीन कभी नहीं मिल सकी। नवंबर 2007 में आखिरी सांस लेने से पूर्व तक वे जिंदगीभर इनाम की जमीन के लिए सरकारों से लड़ते रहे।
चंद्री के बेटे किशन चंद बताते हैं कि जमीन न मिलने की वजह शासन द्वारा आवंटित जमीन पर पहले से ही लोगों का कब्जा होना था। जिसे प्रशासनिक अमला कभी छुड़ा नहीं सका। इस जमीन को हासिल करने के लिए उन्होंने प्रशासनिक अफसरों से लेकर राष्ट्रपति तक से फरियाद की, पर जमीन नहीं मिली। युद्ध में दुश्मनों के दांत खट्टे रने वाला योद्धा अपनों से नहीं जीत सका। बहादुर कारनामे के लिए सरकार द्वारा दान दी गई जमीन को हासिल करने में यह जांबाज सैनिक और उनके परिजन हार गए हैं। जिला पूर्व सैनिक कल्याण अधिकारी (रिटायर्ड) कर्नल वीएस थापा का कहना है कि दान दी गई जमीन का मामला यूएस नगर जिले से संबंधित था।
इसलिए यहां से कार्रवाई के लिए पत्रावली संबंधित जिले भेजी गई थी। इस साल मार्च में चंद्री के सैनिक बेटे राजेंद्र चंद ने मुख्यमंत्री को पत्र देकर आवंटित जमीन को गृह जिले चंपावत में उपलब्ध कराने का आग्रह किया था। सीएम हरीश रावत ने स्वीकृति देते हुए प्रशासन को कार्रवाई के निर्देश दिए थे लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकी है। टनकपुर के एसडीएम नरेश दुर्गापाल का कहना है कि मुख्यमंत्री के पत्र के क्रम में वीरचक्र विजेता चंद्री को चंपावत जिले में भूमि आवंटन के लिए प्रयास किया जा रहा है। राजस्व उप निरीक्षक को भूमि का चयन कर प्रस्ताव देने के निर्देश दिए गए हैं।
जीवनभर तंग हाल रहे वीरचक्र विजेता चंद्री ने कभी उसूलों से समझौता नहीं किया। जीते जी वे आमबाग गांव में आर्थिक संकट में रहे, पर परिवार को फौज में जाने का जुनून नहीं गया। छोटा बेटा फौज में सेवा कर रहा है, तो दूसरा बेटा किशन खेती समेत होटल के जरिए आजीविका चला रहा है।