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पिता के कंधों पर चढ़कर पवनदीप ने पाया ऊंचा मुकाम
Sun, 16 Jun 2019 10:55 PM IST
बृजमोहन बृजमोहन
सतीश जोशी ‘सत्तू’ चंपावत।
सतीश जोशी ‘सत्तू’ चंपावत।
Published by: बृजमोहन बृजमोहन
Updated Sun, 16 Jun 2019 10:55 PM IST
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चंपावत के लोकगायक सुरेश राजन और युवा गायक पवनदीप राजन।
- फोटो : अमर उजाला
जिले के उभरते युवा गायक पवनदीप राजन अपनी जादू भरी आवाज से आज देश-विदेश के हजारों लोगों के आकर्षण का केंद्र बने हैं। उन्हें चंपावत जिले के एक छोटे से गांव से मायानगरी मुंबई तक पहुंचाने में उनके पिता प्रसिद्ध कुमाऊंनी लोकगायक सुरेश राजन का योगदान बेहद अहम रहा है। एंड टीवी के टेलेंट सर्च शो द वॉयस इंडियाज के पहले सत्र के विजेता बनने के बाद वर्तमान में कई फिल्मों और एलबमों में गाने के साथ ही लाइव शो करने में अपना डंका बजाने वाले पवनदीप राजन ने अपने पिता सुरेश राजन के कंधों पर चढ़कर ही ऊंचा मुकाम हासिल किया है।
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कुमाऊंनी लोकगायक सुरेश राजन के बेटे पवनदीप का जन्म 27 जुलाई 1996 में उत्तराखंड के चंपावत जिले में हुआ था। यहीं से उनकी शिक्षा-दीक्षा शुरू हुई। बचपन में ही उनकी रुचि संगीत में थी और उनकी इसी रुचि को देखते हुए उनके पिता ने उन्हें संगीत में ट्रेनिंग देनी शुरू की। वह तीन साल की उम्र में ही पवनदीप को अपने कंधे पर बैठाकर खुद के स्टेज शो में ले जाते थे। पवन के पिता सुरेश राजन बताते हैं कि पवनदीप ने डेढ़ साल की उम्र में अचानक थाली पर दादरा की ताल बजाई थी और तीन साल की उम्र से तबला वादन शुरू कर दिया था।
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पवन ने तीन साल की उम्र में चंपावत में बहुए कुमाऊं महोत्सव में तबला वादन किया था। जबकि सात साल की उम्र में नैनीताल राजभवन में हुए एक कार्यक्रम में पवनदीप ने तबला वादन कर खूब सुर्खियां बटोरी थीं। सुरेश राजन बताते हैं कि बेटे को ऊंचा मुकाम दिलाने के लिए वह उन्हें अपने कंधे पर बैठाकर सांस्कृतिक कार्यक्रमों में ले जाते थे। इस दौरान पवन की संगीत के प्रति बढ़ती रुचि देखकर उन्होंने अपना काम धाम छोड़कर पवन को गीत संगीत में पारंगत बनाया।
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