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राज्य बनने के बाद बनी चंपावत सीट रहा सीधा मुकाबला

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Fri, 21 Jan 2022 10:51 PM IST
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Direct Fight in Champawat
Direct Fight in Champawat
चंपावत। उत्तराखंड बनने के बाद पिथौरागढ़ से अलग होकर पहली बार चंपावत विधानसभा सीट बनी। नेपाल सीमा से लगी चंपावत सीट पर हमेशा भाजपा और कांग्रेस में सीधा मुकाबला रहा है। 2012 के चुनाव को छोड़ तीसरा मोर्चा अपनी जगह बनाने में नाकाम रहा है। 2012 में बसपा भाजपा को पछाड़ दूसरे नंबर पर रही थी। चंपावत सीट के साथ एक रोचक मिथक यह भी है कि यहां से जिस पार्टी का प्रत्याशी जीता, सरकार उसकी की बनी है।
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मैदान और पहाड़ से मिलकर बनी चंपावत सीट पर इस वक्त 45932 महिलाओं सहित 95948 मतदाता हैं। इस सीट पर अल्पसंख्यक छह प्रतिशत से भी कम है। अल्मोड़ा लोकसभा सीट के अंतर्गत आने वालीं 14 विधानसभा सीटों में चंपावत अकेली ऐसी सीट है, जिसमें मैदान का हिस्सा भी शामिल है। बनबसा-टनकपुर मैदानी क्षेत्र में और बस्टिया से आगे पहाड़ी क्षेत्र है। इस विधानसभा सीट में तीन (चंपावत, टनकपुर और बनबसा) नगर निकाय हैं लेकिन विकासखंड महज एक (चंपावत) है। इस सीट की नुमाइंदगी करते हुए एक बार 2007 में भाजपा की बीना महराना को प्रदेश मंत्रिमंडल में जगह मिली थी।
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चंपावत सीट
कुल मतदाता : 95948
पुरुष : 50016 (52.13 प्रतिशत)
महिला : 45932 (47.87 प्रतिशत)
पहली बार के वोटर : 2546
युवा मतदाता (18 से 39 आयु वर्ग) : 45747
प्रमुख मुद्दे
औद्योगिक विकास, टनकपुर-जौलजीबी सड़क में पुल, पूर्णागिरि धाम का रज्जुमार्ग, पूर्णागिरि मुख्य मंदिर की दरार के ट्रीटमेंट का काम, क्वैराल पेयजल योजना के काम में देरी, चंपावत तहसील कार्यालय भवन निर्माण।
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अधूरे वादे
ट्रॉमा सेंटर का संचालन, टनकपुर उप जिला अस्पताल की स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार तो दूर, अल्ट्रासाउंड और एक्सरे की भी व्यवस्था नहीं हो सकी, स्टेडियम, चंपावत हेलीपैड।
वर्ष : विजेता दल व प्रत्याशी
2002 : कांग्रेस हेमेश खर्कवाल
2007 : भाजपा बीना महराना
2012 : कांग्रेस हेमेश खर्कवाल
2017 : भाजपा कैलाश गहतोड़ी
मतदाताओं का कोट
हर बार चुनाव से पहले वादे करना और भूलना अब एक परंपरा बन गई है। महंगाई कम होना तो दूर, उल्टा इस पर अब कोई नियंत्रण नहीं है। - माया देवी, चंपावत।
मां पूर्णागिरि क्षेत्र के पुजारियों की धाम में पानी पहुंचाने के लिए पेयजल योजना की मांग आज तक पूरी नहीं हो सकी। सेलागाड़ गांव से पलायन रोकने के लिए भी कोई काम नहीं हुआ। - पंडित किशन तिवारी, अध्यक्ष, मां पूर्णागिरि मंदिर समिति।
सीमांत के गांवों में खेती को बढ़ावा देने की खूब बातें की गईं, लेकिन पूरी एक भी नहीं हुई। ऐसे न तो गांव का विकास होगा और नहीं पलायन रुकेगा। इसका असर सुरक्षा पर भी पड़ता है। - वीरेंद्र रैंसवाल, पूर्व अर्द्धसुरक्षा बल जवान, चंपावत।
वादों को पूरा करना तो दूर, क्षेत्र में प्रतिनिधियों की मौजूदगी भी कम हो रही है। इसी तरह रोजगार देना तो छोड़िए, नौकरी के लिए परीक्षा होना भी कम हो गया है। - नंदाबल्लभ पंत, सेवानिवृत्त शिक्षक, टनकपुर।
वादें पूरा करने का प्रयास किया गया। चंपावत में रोडवेज स्टेशन का निर्माण किया। विधायक निधि से न केवल लोगों की जरूरत के हिसाब से उपयोग किया गया, बल्कि 100 से अधिक गांवों में सड़क भी कटाई गई। कोरोना की वजह से कुछ कामों की गति भी प्रभावित हुई। - कैलाश गहतोड़ी, विधायक।

नए काम तो दूर, उनके द्वारा शुरू कार्यों को भी पूरा नहीं करा सकी। क्वैराला पेयजल योजना, हेलीपैड लटके हैं। वहीं स्टेडियम, जिला जेल भवन सहित ढेरों काम जहां के तहां हैं। मंच उप तहसील में ताले लटक गए और दो आईटीआई बंद हो गए हैं। - हेमेश खर्कवाल, रनर अप और पूर्व विधायक।
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